ईदुल फित्र: रहमत, शुक्र और इंसानियत का पैगाम

Update: 2026-03-20 11:48 GMT


रमज़ानुल मुबारक की मुकम्मल इबादतों—रोज़ा, तरावीह, तिलावत-ए-क़ुरआन और ऐतिकाफ—के बाद ईदुल फित्र अल्लाह की रहमत, मग़फ़िरत और दोज़ख से निजात की खुशख़बरी का दिन है। इस मुबारक दिन का हुक्म हिजरत के दूसरे साल मदीना मुनव्वरा में नाज़िल हुआ। जिस तरह कोई क़ौम अपनी आज़ादी या कामयाबी पर जश्न मनाती है, उसी तरह मुसलमान रमज़ान की बरकतों के हासिल होने पर अल्लाह का शुक्र अदा करते हुए ईद की नमाज़ अदा करते हैं और खुशियां मनाते हैं।

“फित्र” के मानी फितरत और अता के हैं। ईदुल फित्र के साथ जुड़ा सदक़ा-ए-फित्र इस त्योहार की सामाजिक रूह को उजागर करता है। हर साहिब-ए-निसाब मुसलमान पर वाजिब है कि वह अपने घर के हर सदस्य की तरफ़ से फित्रा अदा करे, ताकि गरीब, मिस्कीन, यतीम और बेसहारा लोग भी ईद की खुशियों में बराबर के शरीक हो सकें। यह अमल रोज़ों में हुई कोताहियों की तदारुक और उनकी क़ुबूलियत का ज़रिया भी बनता है।

ईद का दिन अल्लाह की तरफ़ से इनाम और आम माफी का दिन बताया गया है। रिवायतों के मुताबिक, इस दिन बंदों पर इतनी रहमतें नाज़िल होती हैं कि शैतान मायूस हो जाता है और इंसानों को नेकियों से दूर करने की कोशिश करता है। ऐसे में ज़रूरत है कि मुसलमान इस मुबारक मौके की असल रूह को समझें और इसे महज़ दुनियावी लुत्फ़—नाच-गाने, फ़ुज़ूल मशग़लों या बेढंगे मेलों—तक महदूद न करें, बल्कि इबादत, शुक्र और नेक अमल के साथ मनाएं।

ईदुल फित्र हमें दो अहम पैगाम देती है—पहला, अल्लाह के एहसानात पर दिल से शुक्र अदा करना; और दूसरा, समाज के कमज़ोर तबक़ों का ख़याल रखते हुए भाईचारा, मोहब्बत और मेल-मिलाप को बढ़ावा देना। यह दिन गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे से गले मिलने, रिश्तों को मज़बूत करने और इंसानियत की बुनियाद को मजबूत करने का बेहतरीन मौका है।

दरअसल, ईदुल फित्र सिर्फ़ एक त्योहार नहीं, बल्कि इबादत की कामयाबी का इज़हार और एक बेहतर समाज की तामीर का पैगाम है।

— मुहम्मद उस्मान अज़हरी, बिलारी

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