UN ने पाकिस्तान को फटकारा, कहा-नये संशोधन से लोकतंत्र होगा कमजोर...मुनीर बन जाएगा तानाशाह

संयुक्त राष्ट्र: संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायोग (ओएचसीएचआर) के प्रमुख वोल्कर टर्क ने पाकिस्तान में हाल ही में पारित संवैधानिक संशोधनों पर गहरी चिंता जताई है। उनका कहना है कि ये बदलाव न्यायपालिका की स्वतंत्रता को गंभीर रूप से कमजोर कर रहे हैं, जो लोकतांत्रिक सिद्धांतों, सैन्य जवाबदेही और कानून के शासन के लिए दूरगामी खतरा पैदा कर सकते हैं।
मुनीर बन जाएगा तानाशाह
पाकिस्तान ने गत 13 नवंबर को संसद द्वारा जल्दबाजी में 27वें संवैधानिक संशोधन के तहत एक नई ‘संघीय संवैधानिक अदालत’ (एफसीसी) का गठन किया गया है। इस अदालत को संवैधानिक मामलों की सुनवाई का अधिकार सौंपा गया है, जो पहले पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय के पास था। अब सुप्रीम कोर्ट केवल सिविल और आपराधिक मामलों तक सीमित रह जाएगा। इसके अलावा, संशोधन में राष्ट्रपति, फील्ड मार्शल, एयर फोर्स मार्शल और नौसेना एडमिरल को आजीवन आपराधिक कार्यवाही या गिरफ्तारी से पूर्ण छूट प्रदान की गई है। यह प्रावधान सैन्य नेतृत्व को अभूतपूर्व संरक्षण देता है। जो पाकिस्तान के पहले चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (सीडीएफ) बनाए गए असीम मुनीर को तानाशाह बना सकती है।
वोल्कर टर्क ने जताई गहरी चिंता
पाकिस्तान के इस संशोधन पर वोल्कर टर्क ने गहरी चिंता जाहिर की है। उन्होंने शुक्रवार को कहा, “ये संशोधन व्यापक विचार-विमर्श, कानूनी विशेषज्ञों और नागरिक समाज की भागीदारी के बिना पारित किए गए। पिछले साल 26वें संशोधन के साथ भी यही जल्दबाजी देखी गई थी।” उन्होंने चेतावनी दी कि ये बदलाव शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के विपरीत हैं, जो कानून के शासन और मानवाधिकारों की रक्षा की नींव हैं। इसमें न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदोन्नति और स्थानांतरण की प्रक्रिया में भी व्यापक परिवर्तन किए गए हैं। उच्चायोग के अनुसार, ये बदलाव न्यायपालिका की संरचनात्मक स्वतंत्रता को कमजोर कर सकते हैं।
न्यायपालिका हो जाएगी कमजोर
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार पाकिस्तान के इस कदम से वहां की न्यायपालिका कमजोर हो जाएगी। खासकर, प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा एफसीसी के पहले न्यायाधीशों की नियुक्ति से राजनीतिक हस्तक्षेप का खतरा बढ़ गया है। टर्क ने जोर देकर कहा, “न तो कार्यपालिका और न ही विधायिका को न्यायपालिका पर नियंत्रण या निर्देश देने का अधिकार होना चाहिए। निर्णय प्रक्रिया को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त रखना जरूरी है।” उन्होंने याद दिलाया कि न्यायिक स्वतंत्रता का मूल्यांकन इस बात से होता है कि ट्रिब्यूनल को सरकारी हस्तक्षेप से कितना अलग रखा जाता है। “यदि जज स्वतंत्र नहीं हैं, तो वे कानून को समान रूप से लागू करने और राजनीतिक दबाव में मानवाधिकारों की रक्षा करने में असफल रहते हैं।”जवाबदेही तंत्र पर भी संशोधन का बुरा असर पड़ सकता है।
सेना को दी गई व्यापक छूट से लोकतंत्र होगा कमजोर
टर्क ने कहा कि सैन्य अधिकारियों को दी गई व्यापक छूट से मानवाधिकार ढांचा और लोकतांत्रिक नियंत्रण कमजोर होगा। उन्होंने कहा, “ऐसे प्रावधान जवाबदेही को नष्ट करते हैं, जो पाकिस्तान जैसे देश में लोकतंत्र की बुनियाद हैं।” पाकिस्तान में ये संशोधन इमरान खान सरकार के खिलाफ विपक्षी दबाव के बीच आए हैं, जहां न्यायपालिका पर सैन्य प्रभाव के आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र ने पाकिस्तान से इन बदलावों पर पुनर्विचार करने और नागरिक समाज को शामिल करने को कहा है। मानवाधिकार कार्यकर्ता इसे ‘संवैधानिक तख्तापलट’ बता रहे हैं, जो सैन्य वर्चस्व को मजबूत करेगा। टर्क ने अंत में कहा, “पाकिस्तान की जनता के लिए लोकतंत्र और कानून का शासन सर्वोपरि है। इन सिद्धांतों की रक्षा हर सरकार का कर्तव्य है।”




