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न कोई डील, न देने पड़े टोल…होर्मुज से ऐसे निकले भारत के जहाज, 15 दिन बाद आई अंदर की कहानी

न कोई डील, न देने पड़े टोल…होर्मुज से ऐसे निकले भारत के जहाज, 15 दिन बाद आई अंदर की कहानी
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ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव के कारण होर्मुज स्ट्रेट सुर्खियों में है. ईरान इस मार्ग से मालवाहक जहाजों को अपनी सुविधा के अनुसार गुजरने दे रहा है. जहाजों को निकलने देने के लिए ईरान ने दो शर्तें तय की हैं—एक डील और दूसरी टोल वसूली. इन्हीं शर्तों के तहत चीन, मलेशिया और पाकिस्तान जैसे देशों के मालवाहक जहाज होर्मुज से गुजरे हैं. हालांकि भारत ने भी इस मार्ग से अपने तीन जहाज लाए, लेकिन इसके लिए न तो भारत ने कोई डील की और न ही टोल टैक्स दिया.

ब्लूमबर्ग ने इसको लेकर विदेश मंत्रालय के सूत्रों के हवाले से एक रिपोर्ट की है. इसके मुताबिक, अपने तेल और गैस से लदे मालवाहक जहाजों को लाने के लिए भारत ने कूटनीतिक रास्ता अपनाया. इसके तहत सबसे पहले अयातुल्ला अली खामेनेई को लेकर नई दिल्ली में आयोजित हुए शोक सभा में भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री शामिल हुए.

बातचीत से निकला होर्मुज का रास्ता

रिपोर्ट के मुताबिक शुरुआत में भारत के लिए दोनों देशों को साधना आसान नहीं था. क्योंकि, ईरान भारत का लंबे वक्त से मित्र देश रहा है, जबकि अमेरिका और इजराइल के साथ उसके कई रक्षा और नीतिगत समझौते हैं. ऐसे में किसी एक के पक्ष में दिखना स्थिति को बिगाड़ सकता था.

खामेनेई की शोक सभा में विक्रम मिस्री के शामिल होने के बाद भारत ने बातचीत तेज की. खुद विदेश मंत्री एस जयशंकर ने उस दौरान कम से कम 3 बार अपने ईरानी समकक्ष से फोन पर बात की. इसके बाद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजेशकियन से बात की.

इन्हीं बातचीत में होर्मुज का रास्ता निकला. नई दिल्ली में ईरान के राजदूत ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई. इसके बाद ईरान सरकार ने इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड को भारत के जहाजों को सेफ रास्ता देने का निर्देश दिया.

भारत ने भी ईरान की मदद की

ब्लूमबर्ग के मुताबिक, बातचीत का रास्ता उस फैसले के बाद खुला, जिसमें भारत ने ईरान के एक नौसैनिक जहाज को कोच्चि में लंगर डालने की सहमति दी. क्योंकि इसी दिन श्रीलंका के क्षेत्र में ईरान के युद्धपोत डेना को अमेरिका ने पनडुब्बी के जरिए डुबो दिया था. यह ईरान के लिए बड़ा झटका था.

भारत अगर कोच्चि में लंगर डालने की अनुमति नहीं देता तो नौसैनिक जहाज पर भी अमेरिका निशाना साध सकता था. ईरान ने इस बात को समझा और भारत से कूटनीतिक बातचीत शुरू की.

भारत में जहाज आने के बाद विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बयान भी दिया था. जयशंकर ने उस वक्त कहा था- एक-एक टैंकर को लाने की व्यवस्था की जा रही है. ईरान से इसको लेकर कोई समझौता नहीं किया गया है.

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