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संसद के बजट सत्र में सियासी टकराव तेज : राज्यसभा में नड्डा-खरगे आमने-सामने, सभापति ने मर्यादा का दिया संदेश

संसद के बजट सत्र में सियासी टकराव तेज : राज्यसभा में नड्डा-खरगे आमने-सामने, सभापति ने मर्यादा का दिया संदेश
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रिपोर्ट : विजय तिवारी

नई दिल्ली।

संसद के बजट सत्र के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच लगातार गतिरोध बना हुआ है। लोकसभा के बाद अब राज्यसभा में भी राजनीतिक तकरार खुलकर सामने आई है। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान राज्यसभा में सदन के नेता जेपी नड्डा और नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बीच लोकतंत्र, संसदीय मर्यादा और राजनीतिक आचरण को लेकर तीखी बहस हुई।

नड्डा का तंज, बिना नाम लिए राहुल गांधी पर टिप्पणी

चर्चा के दौरान जेपी नड्डा ने विपक्ष के रवैये पर सवाल उठाते हुए कहा कि पार्टी को किसी “अबोध बालक” के इशारे पर नहीं चलना चाहिए। हालांकि उन्होंने सीधे तौर पर नाम नहीं लिया, लेकिन विपक्ष ने इसे कांग्रेस सांसद राहुल गांधी की ओर संकेत मानते हुए आपत्ति जताई।

नड्डा ने यह भी कहा कि विपक्ष को लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और संसदीय नियमों के तहत अपनी बात रखनी चाहिए और सदन की कार्यवाही को बाधित नहीं करना चाहिए।

खरगे का पलटवार,

लोकसभा का मुद्दा उठाया

नड्डा की टिप्पणी पर नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कड़ा विरोध दर्ज कराया। उन्होंने कहा कि यदि लोकसभा में विपक्ष के नेता को बोलने का अवसर नहीं दिया जाएगा, तो यह मुद्दा राज्यसभा में उठना स्वाभाविक है।

खरगे ने कहा कि संसद केवल एक सदन नहीं, बल्कि लोकसभा और राज्यसभा दोनों से मिलकर बनती है और किसी भी सदन में विपक्ष की आवाज को दबाया नहीं जा सकता।

शब्दों की मर्यादा पर सभापति का हस्तक्षेप

बहस के दौरान बढ़ते शोर-शराबे को देखते हुए

राज्यसभा के सभापति राधाकृष्णन ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने सदस्यों से तथ्यपरक और मर्यादित भाषा में अपनी बात रखने की अपील की और स्पष्ट किया कि असंसदीय शब्दों की अनुमति नहीं दी जा सकती।

सभापति ने कुछ आपत्तिजनक टिप्पणियों को कार्यवाही से हटाने के निर्देश भी दिए।

बजट सत्र में गतिरोध बरकरार

बजट सत्र के सातवें दिन भी दोनों सदनों में हंगामे का असर कार्यवाही पर पड़ा। सत्ता पक्ष का कहना है कि सरकार हर विषय पर चर्चा के लिए तैयार है, जबकि विपक्ष का आरोप है कि उसे बोलने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया जा रहा। इस टकराव के चलते कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा प्रभावित हुई है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि संवाद का रास्ता नहीं निकला, तो बजट सत्र में विधायी कार्यों की रफ्तार और धीमी हो सकती है।

राज्यसभा में हुई यह बहस केवल एक राजनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संसद में संवाद, असहमति और संसदीय मर्यादाओं की कसौटी भी बन गई है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार और विपक्ष के बीच सहमति बनती है या सियासी टकराव और गहराता है।

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