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लद्दाख : स्पितुक मठ में वार्षिक ‘स्पितुक गुस्टर’ महोत्सव का शुभारंभ, कठोर सर्दियों के पहले चरण का समापन

लद्दाख : स्पितुक मठ में वार्षिक ‘स्पितुक गुस्टर’ महोत्सव का शुभारंभ, कठोर सर्दियों के पहले चरण का समापन
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रिपोर्ट : विजय तिवारी

लद्दाख के ऐतिहासिक और प्रसिद्ध बौद्ध धार्मिक केंद्र Spituk Monastery में वार्षिक धार्मिक महोत्सव स्पितुक गुस्टर का आज विधिवत शुभारंभ हो गया। यह पर्व हिमालयी बौद्ध परंपरा का एक प्रमुख उत्सव है, जो आध्यात्मिक साधना, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक समरसता को एक साथ प्रस्तुत करता है।

स्पितुक गुस्टर महोत्सव एक सप्ताह तक चले विशेष प्रार्थना सत्रों, धार्मिक अनुष्ठानों और मंत्रोच्चार के समापन के बाद आयोजित किया जाता है। इन अनुष्ठानों के माध्यम से विश्व शांति, मानव कल्याण, समृद्धि तथा नकारात्मक शक्तियों पर सकारात्मक ऊर्जा की विजय की कामना की जाती है। बौद्ध मान्यताओं के अनुसार ‘गुस्टर’ का भावार्थ बुराई के विनाश और धर्म की पुनर्स्थापना से जुड़ा हुआ है।

महोत्सव के दौरान मठ परिसर में पारंपरिक चाम नृत्य (मुखौटा नृत्य) का आयोजन किया जाता है। इन नृत्यों में बौद्ध देवताओं, रक्षक शक्तियों और धर्मपालों का प्रतीकात्मक स्वरूप प्रस्तुत होता है, जो अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश देता है। वरिष्ठ लामा और भिक्षु पारंपरिक वेशभूषा में धार्मिक अनुष्ठानों का संचालन करते हैं। मंत्रोच्चार, धूप-दीप और धार्मिक प्रतीकों के माध्यम से संपूर्ण वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर जाता है।

इस महोत्सव का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यह Ladakh में सर्दियों के सबसे कठोर और चुनौतीपूर्ण पहले चरण के समापन का संकेत देता है। लंबे समय तक शून्य से नीचे तापमान और भारी बर्फबारी झेलने के बाद यह पर्व स्थानीय लोगों के लिए आशा, नई शुरुआत और सकारात्मकता का प्रतीक बनकर सामने आता है।

स्पितुक गुस्टर महोत्सव का प्रभाव केवल धार्मिक और सांस्कृतिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका सीधा लाभ पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। हर वर्ष की तरह इस बार भी बड़ी संख्या में स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ-साथ देश-विदेश से पर्यटक मठ परिसर में पहुंच रहे हैं। इससे धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलता है और स्थानीय हस्तशिल्प, परिवहन, होम-स्टे तथा अन्य सेवाओं से जुड़े लोगों को आर्थिक संबल प्राप्त होता है।

समग्र रूप से, स्पितुक गुस्टर महोत्सव लद्दाख की समृद्ध बौद्ध परंपरा, सांस्कृतिक पहचान और आध्यात्मिक चेतना का सशक्त प्रतीक है, जो कठिन प्राकृतिक परिस्थितियों के बीच भी आस्था, उत्सव और सामूहिक एकता की निरंतरता को दर्शाता है।

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