UGC नियमों से बिगड़ा सवर्णों का मूड, बीजेपी के गले की फांस बन गया

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक लगा दी है. बीजेपी के नेता कोर्ट के फैसले का स्वागत कर रहे हैं, लेकिन क्या इससे पार्टी की चुनौती खत्म हो गई है? यूजीसी के नए नियम का विरोध करने वाले सवर्ण जाति के संगठन और छात्र सिर्फ कोर्ट के स्टे से संतुष्ट नहीं है. उनका कहना है कि यूजीसी के नियम जब पूरी तरह से वापस नहीं ले लिए जाते, तब तक विरोध करते रहेंगे.
यूजीसी का विवाद बीजेपी के गले की फांस बन गया है, जो अब उसे न उगलते बन रहा और न निगलते. सुप्रीम कोर्ट के रोक के बावजूद करणी सेना, अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा और ब्राह्मण महासभा से लेकर परशुराम सेना तक सड़क से सोशल मीडिया तक अपनी लड़ाई जारी रखने की बात कह रहे हैं. इससे साफ है कि बीजेपी की मुसीबत अभी खत्म नहीं होने वाली?
यूजीसी को लेकर विरोध प्रदर्शन का सबसे बड़ा केंद्र उत्तर प्रदेश रहा है. यूपी बीजेपी के अंदर ही इसका जमकर विरोध रहा. पार्टी के कई स्थानीय और जिला स्तर के नेताओं और पदाधिकारियों ने अपने पद से इस्तीफा तक दे दिया. सवर्णों की बढ़ती नाराजगी को लेकर बीजेपी के नेता कशमकश में फंसे हुए नजर आ रहे हैं और सपा से बसपा तक के सधे हुए बयान देकर सियासी दांव चल रहे हैं?
सुप्रीम कोर्ट के स्टे के बाद अब सरकार को जवाब देना है. अगर बीजेपी सरकार यूजीसी के नए नियमों को सही बताती है तो सवर्णों की नाराजगी झेलनी होगी. सवर्ण संगठन 19 मार्च तक अपने आंदोलन को जारी रखने का ऐलान किया है. सवर्ण संगठनों में राजपूत समाज से लेकर ब्राह्मण, कायस्थ, वैश्य, खत्री ही नहीं बल्कि मुसलमानों के सवर्ण जाति के संगठन शामिल हैं.
वहीं, अगर सरकार नियमों को वापस लेने का कदम उठाती है तो फिर एससी, एसटी, ओबीसी की तरफ से विरोध झेलना पड़ सकता है. ऐसे में यूजीसी के नए नियम को लेकर बीजेपी दोहराए पर खड़ी है. एक तरफ बीजेपी का अपने परंपरागत वोटर सवर्ण है तो दूसरी तरफ दलित-ओबीसी को साधे रखने की चुनौती है. ऐसे में बीजेपी के लिए सियासी बैलेंस बनाए रखने का चुनौती बन गया है.
बीजेपी का शुरू से ही सामाजिक आधार सवर्ण जाति के वोटर रहे हैं. बीजेपी सत्ता में नहीं थी, तब भी उसे सवर्णों का अच्छा खासा वोट मिलता रहा. यूजीसी के नए नियमों को लेकर विरोध सवर्ण संगठन कर रहे हैं. बीजेपी के भीतर ही लोगों का मानना है कि इससे बीजेपी को नुकसान उठाना पड़ सकता है. बीजेपी के एक नेता ने कहा कि हमें अपने समर्थकों को समझाना मुश्किल हो रहा है और अगर हम विरोध नहीं करेंगे तो हमारे समर्थक हम पर ही सवाल उठाएंगे.
बीजेपी एक मौजूदा विधायक ने भी कही है. उन्होंने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पार्टी जिस तरह से अपने परंपरागत सवर्ण वोटों को पूरी तरह से नजर अंदाज कर रही है, उससे समाज में बेचैनी पहले से थी और अब यूजीसी विवाद ने उसे और भी बढ़ा दिया है. बीजेपी के पूर्व सांसद बृज भूषण शरण सिंह से लेकर उनके बेटे प्रतीक भूषण और विधायक अभिजीत सिंह सांगा सहित डा. संजय सिंह तक यूजीसी के नए नियम का विरोध किया है. बीजेपी नेता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भले ही स्टे दे दिया हो, लेकिन विरोध अभी भी जारी है.
यूपी में बीजेपी का गेम न खराब कर दे?
यूपी की सियासत पूरी तरह से जातियों के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है और यूजीसी विवाद ने नई लकीरें खींच दी हैं. सूबे की आबादी में सवर्ण जातियां ब्राह्मण, ठाकुर और वैश्य को मिलाकर करीब 22 फीसदी के साथ महत्वपूर्ण वोट बैंक हैं. यह पारंपरिक रूप से बीजेपी का माना जाता है, लेकिन इस विवाद ने उन्हें नाराज कर दिया है, क्योंकि वे नियमों को रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन के रूप में देखते हैं. जनरल कटैगरी के युवाओं का कहना है कि ये नए नियम जनरल कटैगरी के खिलाफ हैं और इससे रिवर्स भेदभाव शुरू हो जाएगा.




