Janta Ki Awaz
उत्तर प्रदेश

भगवान गणेश के प्रमुख 8 अवतारों का वर्णन

भगवान गणेश के प्रमुख 8 अवतारों का वर्णन
X

सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः।

लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः।।

धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः।

द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि।।

विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा।

संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते।।

1. सुमुख 2.एकदन्त 3.कपिल 4. गजकर्णक 5. लम्बोदर 6. विकट 7. विघ्ननाश 8. विनायक 9. धूम्रकेतु 10. गणाध्यक्ष 11. भालचन्द्र 12. गजानन - इन बारह नामों का- विद्यारम्भकाल में, विवाहकाल में, प्रवेशकाल में, निर्गम काल में (यात्रा के समय), संग्राम के समय और संकट के समय जो पाठ करे अथवा सुने भी, उन्हें कोई विध्न नहीं होता है।

भगवान श्रीगणेश जी के जन्म दिन के उत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में जाना जाता है। गणेश चतुर्थी को विनायक चतुर्थी और गणेश चौथ के नाम से भी जाना जाता है।गणेश चतुर्थी के दिन, भगवान गणेश को बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता के रूप में पूजा जाता है।

पुराणों के अनुसार :- चंद्रवार, स्वाति नक्षत्र, सिंह लग्न में पांच शुभ ग्रहों के एकत्रित होने पर भाद्र शुक्ल चतुर्थी को मध्याह्न काल में पार्वती के षोड़षोपचार से इनकी पूजा करने से त्रिनयन गणेश प्रकट हुए।

गणेशोत्सव अर्थात गणेश चतुर्थी का उत्सव, १० दिन के बाद, अनन्त चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है और यह दिन गणेश विसर्जन के नाम से जाना जाता है। अनन्त चतुर्दशी के दिन श्रद्धालु-जन बड़े ही धूम-धाम के साथ सड़क पर जुलूस निकालते हुए भगवान गणेश की प्रतिमा का सरोवर, झील, नदी इत्यादि में विसर्जन करते हैं।

गणेश चतुर्थी पर निषिद्ध चन्द्र-दर्शन:-

गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्र-दर्शन वर्ज्य होता है। इस दिन चन्द्र के दर्शन करने से मिथ्या दोष अथवा मिथ्या कलंक लगता है जिसकी वजह से दर्शनार्थी को चोरी का झूठा आरोप सहना पड़ता है।

पौराणिक गाथाओं के अनुसार, भगवान कृष्ण पर स्यमन्तक नाम की कीमती मणि चोरी करने का झूठा आरोप लगा था। झूठे आरोप में लिप्त भगवान कृष्ण की स्थिति देख के, नारद ऋषि ने उन्हें बताया कि भगवान कृष्ण ने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चन्द्रमा को देखा था जिसकी वजह से उन्हें मिथ्या दोष का श्राप लगा है।

नारद ऋषि ने भगवान कृष्ण को आगे बतलाते हुए कहा कि भगवान गणेश ने चन्द्र देव को श्राप दिया था कि जो व्यक्ति भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दौरान चन्द्र के दर्शन करेगा वह मिथ्या दोष से अभिशापित हो जायेगा और समाज में चोरी के झूठे आरोप से कलंकित हो जायेगा। नारद ऋषि के परामर्श पर भगवान कृष्ण ने मिथ्या दोष से मुक्ति के लिये गणेश चतुर्थी के व्रत को किया और मिथ्या दोष से मुक्त हो गये।

अगर भूल से गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्रमा के दर्शन हो जायें तो मिथ्या दोष से बचाव के लिये निम्नलिखित मन्त्र का जाप करना चाहिये -

सिंहः प्रसेनमवधीत्सिंहो जाम्बवता हतः।

सुकुमारक मारोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥

भगवान गणेश के प्रमुख 8 अवतारों का वर्णन:-

अन्य सभी देवताओं के समान भगवान गणेश ने भी आसुरी शक्तियों के विनाश के लिए विभिन्न अवतार लिए। श्रीगणेश के इन अवतारों का वर्णन गणेश पुराण, मुद्गल पुराण, गणेश अंक आदि ग्रंथो में मिलता है।जानिए श्रीगणेश के अवतारों के बारे में-

१:- वक्रतुंड-

वक्रतुंड का अवतार राक्षस मत्सरासुर के दमन के लिए हुआ था। मत्सरासुर शिव भक्त था और उसने शिव की उपासना करके वरदान पा लिया था कि उसे किसी से भय नहीं रहेगा। मत्सरासुर ने देवगुरु शुक्राचार्य की आज्ञा से देवताओं को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। उसके दो पुत्र भी थे सुंदरप्रिय और विषयप्रिय, ये दोनों भी बहुत अत्याचारी थे। सारे देवता शिव की शरण में पहुंच गए। शिव ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे गणेश का आह्वान करें, गणपति वक्रतुंड अवतार लेकर आएंगे। देवताओं ने आराधना की और गणपति ने वक्रतुंड अवतार लिया। वक्रतुंड भगवान ने मत्सरासुर के दोनों पुत्रों का संहार किया और मत्सरासुर को भी पराजित कर दिया। वही मत्सरासुर कालांतर में गणपति का भक्त हो गया।

२:- एकदंत -

महर्षि च्यवन ने अपने तपोबल से मद की रचना की। वह च्यवन का पुत्र कहलाया। मद ने दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य से दीक्षा ली। शुक्राचार्य ने उसे हर तरह की विद्या में निपुण बनाया। शिक्षा होने पर उसने देवताओं का विरोध शुरू कर दिया। सारे देवता उससे प्रताडि़त रहने लगे। मद इतना शक्तिशाली हो चुका था कि उसने भगवान शिव को भी पराजित कर दिया। सारे देवताओं ने मिलकर गणपति की आराधना की। तब भगवान गणेश एकदंत रूप में प्रकट हुए। उनकी चार भुजाएं थीं, एक दांत था, पेट बड़ा था और उनका सिर हाथी के समान था। उनके हाथ में पाश, परशु और एक खिला हुआ कमल था। एकदंत ने देवताओं को अभय वरदान दिया और मदासुर को युद्ध में पराजित किया।

३:- महोदर -

जब कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया तो दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने मोहासुर नाम के दैत्य को संस्कार देकर देवताओं के खिलाफ खड़ा कर दिया। मोहासुर से मुक्ति के लिए देवताओं ने गणेश की उपासना की। तब गणेश ने महोदर अवतार लिया। महोदर का उदर यानी पेट बहुत बड़ा था। वे मूषक पर सवार होकर मोहासुर के नगर में पहुंचे तो मोहासुर ने बिना युद्ध किये ही गणपति को अपना इष्ट बना लिया।

४:- गजानन -

एक बार धनराज कुबेर भगवान शिव-पार्वती के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत पर पहुंचा। वहां पार्वती को देख कुबेर के मन में काम प्रधान लोभ जागा। उसी लोभ से लोभासुर का जन्म हुआ। वह शुक्राचार्य की शरण में गया और उसने शुक्राचार्य के आदेश पर शिव की उपासना शुरू की। शिव लोभासुर से प्रसन्न हो गए। उन्होंने उसे सबसे निर्भय होने का वरदान दिया। इसके बाद लोभासुर ने सारे लोकों पर कब्जा कर लिया और खुद शिव को भी उसके लिए कैलाश को त्यागना पड़ा। तब देवगुरु ने सारे देवताओं को गणेश की उपासना करने की सलाह दी। गणेश ने गजानन रूप में दर्शन दिए और देवताओं को वरदान दिया कि मैं लोभासुर को पराजित करूंगा। गणेश ने लोभासुर को युद्ध के लिए संदेश भेजा। शुक्राचार्य की सलाह पर लोभासुर ने बिना युद्ध किए ही अपनी पराजय स्वीकार कर ली।

५:- लंबोदर -

समुद्रमंथन के समय भगवान विष्णु ने जब मोहिनी रूप धरा तो शिव उन पर काम मोहित हो गए। उनका शुक्र स्खलित हुआ, जिससे एक काले रंग के दैत्य की उत्पत्ति हुई। इस दैत्य का नाम क्रोधासुर था। क्रोधासुर ने सूर्य की उपासना करके उनसे ब्रह्मांड विजय का वरदान ले लिया। क्रोधासुर के इस वरदान के कारण सारे देवता भयभीत हो गए। वो युद्ध करने निकल पड़ा। तब गणपति ने लंबोदर रूप धरकर उसे रोक लिया। क्रोधासुर को समझाया और उसे ये आभास दिलाया कि वो संसार में कभी अजेय योद्धा नहीं हो सकता। क्रोधासुर ने अपना विजयी अभियान रोक दिया और सब छोड़कर पाताल लोक में चला गया।

६:-विकटानन -

भगवान विष्णु ने जलंधर के विनाश के लिए उसकी पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग किया। उससे एक दैत्य उत्पन्न हुआ, उसका नाम था कामासुर। कामासुर ने शिव की आराधना करके त्रिलोक विजय का वरदान पा लिया। इसके बाद उसने अन्य दैत्यों की तरह ही देवताओं पर अत्याचार करने शुरू कर दिए। तब सारे देवताओं ने भगवान गणेश का ध्यान किया। तब भगवान गणपति ने विकट रूप में अवतार लिया। विकट रूप में भगवान मोर पर विराजित होकर अवतरित हुए। उन्होंने देवताओं को अभय वरदान देकर कामासुर को पराजित किया।

७:- विघ्नराज-

एक बार पार्वती अपनी सखियों के साथ बातचीत के दौरान जोर से हंस पड़ीं। उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। पार्वती ने उसका नाम मम (ममता) रख दिया। वह माता पार्वती से मिलने के बाद वन में तप के लिए चला गया। वहीं उसकी मुलाकात शम्बरासुर से हुई। शम्बरासुर ने उसे कई आसुरी शक्तियां सीखा दीं। उसने मम को गणेश की उपासना करने को कहा। मम ने गणपति को प्रसन्न कर ब्रह्मांड का राज मांग लिया।

शम्बर ने उसका विवाह अपनी पुत्री मोहिनी के साथ कर दिया। शुक्राचार्य ने मम के तप के बारे में सुना तो उसे दैत्यराज के पद पर विभूषित कर दिया। ममासुर ने भी अत्याचार शुरू कर दिए और सारे देवताओं के बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया। तब देवताओं ने गणेश की उपासना की। गणेश विघ्नराज के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने ममासुर का मान मर्दन कर देवताओं को छुड़वाया।

८:- धुम्रवर्ण -

एक बार भगवान ब्रह्मा ने सूर्यदेव को कर्म राज्य का स्वामी नियुक्त कर दिया। राजा बनते ही सूर्य को अभिमान हो गया। उन्हें एक बार छींक आ गई और उस छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। उसका नाम था अहम। वो शुक्राचार्य के समीप गया और उन्हें गुरु बना लिया। वह अहम से अहंतासुर हो गया। उसने खुद का एक राज्य बसा लिया और भगवान गणेश को तप से प्रसन्न करके वरदान प्राप्त कर लिए।

उसने भी बहुत अत्याचार और अनाचार फैलाया। तब गणेश ने धूम्रवर्ण के रूप में अवतार लिया। उनका वर्ण धुंए जैसा था। वे विकराल थे। उनके हाथ में भीषण पाश था जिससे बहुत ज्वालाएं निकलती थीं। धूम्रवर्ण ने अहंतासुर का पराभाव किया। उसे युद्ध में हराकर अपनी भक्ति प्रदान की।

गणेशजी कैस हुए गजमुख:-

स्कन्दपुराण के अनुसार मां पार्वती ने अपने शरीर की उबटन की बत्तियों से एक शिशु बनाकर उसमें प्राणों का संचार कर गण के रूप में उन्हें द्वार पर बैठा दिया। भगवान शिव को द्वार के अन्दर प्रवेश नहीं करने देने पर गण और शिव में युद्ध हुआ। शिवजी ने गण का सिर काट कर द्वार के अंदर प्रवेश किया। पार्वती ने गण को पुन: जीवित करने के लिए शिवजी से कहा। शिवजी ने एक हाथी के शिशु के सिर को गणेश जी के मस्तक पर जोड़कर पुन: जीवित कर पुत्र रूप में स्वीकार किया। इससे ये "गजानंद" कहलाए।

शन‌ि की दृष्ट‌ि से कटा गणेश का स‌िर-

इसी तरह की एक कथा ब्रह्मवैवर्तपुराण में भी आती है कि जब गणेश जी का जन्म हुआ तो श‌िवलोक में उत्सव मनाया जा रहा था। गणेश जी को आशीर्वाद देने के ल‌िए सभी देवी-देवता पधारे, इनमें शन‌ि देव भी शाम‌िल थे। उत्सव से व‌िदा लेते समय शन‌ि महाराज ने भागवान व‌िष्‍णु, ब्रह्मा और श‌िव को प्रणाम क‌िया। शन‌ि देव ने सबसे अंत में देवी पार्वती को प्रणाम ‌क‌िया और गणेश जी को देखे ब‌िना ही आशीर्वाद देकर जाने लगे। इस पर देवी पार्वती ने शन‌ि महाराज को टोकते हुए कहा क‌ि शन‌ि महाराज आप मेरे पुत्र को ब‌िना देखे क्यों जा रहे हैं।

श‌न‌ि महाराज ने कहा क‌ि माता मेरा नहीं देखना ही मंगलकारी है। अगर मेरी दृष्ट‌ि गणेश जी पर पड़ी तो भारी अमंगल होगा। देवी पार्वती ने शन‌ि महाराज को ताना मारते हुए कहा क‌ि तुम मेरे पुत्र के जन्म से प्रसन्न नहीं हो इसल‌िए बहाने बना रहे हो। मेरी आज्ञा है क‌ि तुम मेरे पुत्र को देखो, कुछ भी अमंगल नहीं हो।

देवी पार्वती की आज्ञा का पालन करते हुए जैसे ही शन‌ि महाराज ने गणेश जी को देखा श‌िवलोक में हहाकार मच गया। गणेश जी का स‌िर कट कर हवा में व‌िलीन हो गया। इस दृष्य को देखकर देवी पार्वती बेहोश हो गई। ऐसी स्थ‌ित‌ि में भगवान व‌िष्‍णु ने एक हथ‌िनी के नवजात बच्‍चे का स‌िर काटकर गणेश जी के धड़ से जोड़ द‌िया और गणेश जी गजानन कहलाने लगे।

इस शाप की वजह से बने थे गणेशजी गजानन

पुराणों की एक कथा के अनुसार माली और सुमाली नाम के दो दैत्य भगवान श‌िव के भक्‍त थे। श‌िव भक्त‌ि के प्रभाव से यह शक्त‌िशाली हो गए थे और देवताओं को परेशान करने लगे थे। इससे भगवान सूर्य ने माली और सुमाली से युद्ध क‌िया। भगवान श‌िव जो जब पता चला क‌ि सूर्य उनके भक्तों को मारने पर तुले हैं तो क्रोध‌ित हो उठे और त्र‌िशूल से सूर्य पर प्रहार कर द‌िया।

सूर्य देव इससे अचेत होकर ग‌िर पड़े। सूर्य देव के प‌िता कश्यप ऋष‌ि ने जब देखा क‌ि भगवान श‌िव ने अपने त्र‌िशूल से उनके पुत्र को मृत्यु के करीब पहुंचा द‌िया है तो क्रोध‌ित होकर श‌िव जी को शाप दे द‌िया। कश्‍यप ने कहा क‌ि, ज‌िस प्रकार मेरे पुत्र को आपने मृत्यु के करीब पहुंचा द‌िया है उसी प्रकार आपको भी अपने पुत्र की दुर्दशा देखनी होगी। इस शाप के कारण ही गणेश जी का स‌िर कटा और गजमुख बने।

गणेश चतुर्थी व्रत पूजन निर्णय :-

इस बार संवत् २०७९भाद्रपद शुक्ल पक्ष तृतीया मंगलवार 30 अगस्त सन् 2022 मे चतुर्थी तिथि शांय 02 बजकर 32 मिनट से प्रारंभ होकर 31 अगस्त बुधवार को शांय 01बजकर 32 मिनट तक रहेगी ।

भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल के दौरान हुआ था इसीलिए मध्याह्न के समय को गणेश पूजा के लिये ज्यादा उपयुक्त माना जाता है। जो योग 31 अगस्त बुधवार मिलेगा

मध्याह्न मुहूर्त में, भक्त-लोग पूरे विधि-विधान से गणेश पूजा करेंगे।

गणपति स्थापना और गणपति पूजा मुहूर्त:-

मध्याह्न गणेश पूजा का समय ३०अगस्त को= (१) ०८:५३ से १०:२९तक (२) ११:३९ से १२:३० तक।

30 अगस्त को, चन्द्रमा को नहीं देखने का समय = शांय ०४ : २० से रात्रि ०८ : २२ तक

--------------------------- पं.अनन्त पाठक

--------------ज्योतिष कर्म काण्ड वास्तु कथा प्रवचन

-----------------जेलरोड रायपुरराजा बहराइच उ. प्र.

Next Story
Share it