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बंगाल चुनाव की दहलीज पर कांग्रेस की रणनीति पर मंथन TMC, लेफ्ट या ‘एकला चलो रे’—तीन विकल्पों के बीच उलझा फैसला

बंगाल चुनाव की दहलीज पर कांग्रेस की रणनीति पर मंथन  TMC, लेफ्ट या ‘एकला चलो रे’—तीन विकल्पों के बीच उलझा फैसला
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रिपोर्ट विजय तिवारी

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही राज्य की राजनीति में गतिविधियां तेज हो गई हैं। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) पूरी ताकत के साथ चुनावी तैयारियों में जुटी हैं, जबकि कांग्रेस अब तक यह तय नहीं कर सकी है कि वह किस रणनीति के साथ मैदान में उतरेगी। गठबंधन किया जाए या अकेले चुनाव लड़ा जाए—यही सवाल पार्टी के भीतर विचार-विमर्श का केंद्र बना हुआ है।

राज्य में चुनावी तापमान लगातार बढ़ रहा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी लगातार रैलियों और जनसभाओं के जरिए संगठन को मजबूत करने में लगे हैं। दूसरी ओर भाजपा की चुनावी कमान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संभाल रखी है, जो हालिया बंगाल दौरे के दौरान राज्य सरकार पर तीखे राजनीतिक हमले कर चुके हैं।

इन दो मजबूत राजनीतिक ध्रुवों के बीच कांग्रेस की भूमिका अब भी स्पष्ट नहीं हो पाई है। पार्टी नेतृत्व और प्रदेश इकाई के भीतर यह बहस जारी है कि किस रास्ते पर चलकर संगठन को दोबारा मजबूती और भरोसेमंद जनाधार मिल सकता है।

कांग्रेस के सामने तीन प्रमुख विकल्प

TMC के साथ गठबंधन

कांग्रेस के सामने पहला विकल्प तृणमूल कांग्रेस के साथ चुनावी तालमेल का है। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान TMC द्वारा सीमित सीटों का प्रस्ताव दिए जाने से कांग्रेस में असंतोष जरूर दिखा था, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकजुटता और ‘इंडिया गठबंधन’ के व्यापक समीकरण को देखते हुए पार्टी के एक वर्ग का मानना है कि भाजपा को चुनौती देने के लिए TMC के साथ समझौता उपयोगी हो सकता है।

हालांकि TMC नेतृत्व पहले ही यह संकेत दे चुका है कि बंगाल में भाजपा से मुकाबले के लिए वह कांग्रेस पर निर्भर नहीं है और किसी भी संभावित गठबंधन की शर्तें उसकी रणनीतिक प्राथमिकताओं के अनुरूप होंगी।

‘एकला चलो रे’ की राह

कांग्रेस के लिए दूसरा रास्ता स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने का है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार का मानना है कि राज्य में वाम दलों का प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा है। ऐसे में कांग्रेस को अकेले मैदान में उतरकर भाजपा को मुख्य विपक्षी दल के रूप में चुनौती देनी चाहिए। इस रणनीति के तहत पार्टी अपने पुराने समर्थक वर्ग को फिर से संगठित करने और खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने की कोशिश करना चाहती है।

लेफ्ट के साथ तालमेल

तीसरा विकल्प वाम दलों के साथ गठबंधन का है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी का रुख है कि TMC और BJP—दोनों के खिलाफ संतुलित और आक्रामक विपक्ष खड़ा करने के लिए लेफ्ट के साथ मिलकर चुनाव लड़ना बेहतर हो सकता है। हालांकि पिछली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन को अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी, जिसके कारण इस विकल्प को लेकर भी पार्टी में एकमत नहीं बन पा रहा है।

फैसले में देरी से बढ़ सकती हैं चुनौतियां

हाल के दिनों में कांग्रेस नेतृत्व ने बंगाल से जुड़े सभी प्रमुख नेताओं और गुटों से विचार-विमर्श कर लिया है, लेकिन अब तक अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है। चूंकि राज्य में इसी वर्ष विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं, ऐसे में रणनीति तय करने में और देरी कांग्रेस के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि स्पष्ट दिशा के अभाव में संगठनात्मक तैयारी और चुनावी रणनीति दोनों कमजोर पड़ सकती हैं, जिसका सीधा लाभ प्रतिद्वंद्वी दलों को मिल सकता है।

अब सबकी निगाहें कांग्रेस आलाकमान पर टिकी हैं—क्या पार्टी गठबंधन का रास्ता चुनेगी, लेफ्ट के साथ फिर से तालमेल करेगी या फिर ‘एकला चलो रे’ के संदेश के साथ अकेले चुनावी मैदान में उतरकर पश्चिम बंगाल में अपनी सियासी जमीन दोबारा मजबूत करने की कोशिश करेगी।

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