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उत्तर प्रदेश

बांदा POCSO केस : 10 साल तक चला संगठित अपराध, विशेष अदालत का ऐतिहासिक फैसला — राम भवन और दुर्गावती को फांसी, न्यायाधीश पी.के. मिश्रा का सख्त रुख

बांदा POCSO केस : 10 साल तक चला संगठित अपराध, विशेष अदालत का ऐतिहासिक फैसला — राम भवन और दुर्गावती को फांसी, न्यायाधीश पी.के. मिश्रा का सख्त रुख
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रिपोर्ट : विजय तिवारी

उत्तर प्रदेश के बांदा और चित्रकूट क्षेत्र से जुड़े बहुचर्चित POCSO मामले में विशेष अदालत ने विस्तृत सुनवाई और ठोस साक्ष्यों के आधार पर बड़ा फैसला सुनाया है। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (POCSO) पी.के. मिश्रा की अदालत ने नाबालिग बच्चों के खिलाफ गंभीर अपराधों के दोषी पाए गए दंपति राम भवन और उसकी पत्नी दुर्गावती को मृत्युदंड देते हुए इसे “दुर्लभ से दुर्लभतम” श्रेणी का मामला माना। लंबी जांच, अंतरराष्ट्रीय डिजिटल नेटवर्क और वर्षों तक चले ट्रायल के बाद आया यह फैसला बाल सुरक्षा से जुड़े मामलों में अहम माना जा रहा है।

विशेष पॉक्सो कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि अपराध का पैमाना और पीड़ितों पर पड़े गहरे मानसिक व शारीरिक प्रभाव को देखते हुए कठोर सजा जरूरी है। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि सभी 33 पीड़ित बच्चों के पुनर्वास की प्रभावी व्यवस्था की जाए और प्रत्येक को 10-10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी जाए। साथ ही आरोपियों से जब्त संपत्ति और नकदी को भी पीड़ितों के हित में उपयोग करने की बात कही गई।

जांच एजेंसियों के अनुसार राम भवन, जो पहले सरकारी विभाग में जूनियर इंजीनियर रह चुका था, और उसकी पत्नी दुर्गावती पर आरोप था कि वे बच्चों को पैसे, उपहार और ऑनलाइन गेम्स का लालच देकर अपने संपर्क में लाते थे। आरोप है कि लंबे समय तक यह गतिविधियां अलग-अलग जिलों में जारी रहीं। डिजिटल माध्यमों के जरिए तैयार सामग्री विदेशों तक भेजे जाने के संकेत भी जांच में मिले, जिससे मामला अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराध से जुड़ा माना गया।

मामला सामने आने के बाद केंद्रीय जांच एजेंसी ने विस्तृत जांच शुरू की। इंटरपोल से मिली जानकारी के बाद जांच का दायरा बढ़ाया गया और तकनीकी साक्ष्य जुटाए गए। अक्टूबर 2020 में केस दर्ज होने के बाद फरवरी 2021 में चार्जशीट दाखिल की गई। अदालत में मेडिकल रिपोर्ट, डिजिटल सबूत और पीड़ितों के बयान अहम साबित हुए। सुनवाई के दौरान कई विशेषज्ञों और गवाहों के बयान दर्ज किए गए, जिनके आधार पर अभियोजन पक्ष ने आरोपियों की भूमिका को स्थापित किया।

अदालत के समक्ष पेश रिपोर्टों में बताया गया कि कई बच्चों को गंभीर शारीरिक चोटें आईं और कुछ को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। कई पीड़ित अब भी मानसिक आघात से गुजर रहे हैं और उन्हें काउंसलिंग की जरूरत बताई गई। न्यायाधीश पी.के. मिश्रा ने अपने आदेश में कहा कि इतने बड़े पैमाने पर हुई पीड़ितों की त्रासदी समाज के लिए गंभीर चेतावनी है।

दोषियों को पॉक्सो एक्ट और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी पाया गया, जिनमें गंभीर यौन अपराध, बच्चों का आपराधिक इस्तेमाल, आपराधिक साजिश और डिजिटल माध्यम से अपराध फैलाने जैसे आरोप शामिल थे। अदालत ने माना कि अपराध योजनाबद्ध और लंबे समय तक चलने वाला था, इसलिए इसमें सुधार की संभावना बेहद कम है।

अपने फैसले में अदालत ने कहा कि बच्चों के खिलाफ इस तरह के अपराधों पर सख्त कार्रवाई ही न्याय का उद्देश्य पूरा कर सकती है। साथ ही डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के बढ़ते उपयोग के दौर में अभिभावकों और समाज को अधिक सतर्क रहने की जरूरत बताई गई। यह फैसला न केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, बल्कि बच्चों की सुरक्षा और साइबर अपराध के खिलाफ सख्त संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है।

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