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उत्तर प्रदेश

सीएम से मिलने के 24 घंटे में हटा कब्ज़ा, लेकिन 6 दिसंबर से न्याय के लिए भटक रही थी मेजर की बेटी

सीएम से मिलने के 24 घंटे में हटा कब्ज़ा, लेकिन 6 दिसंबर से न्याय के लिए भटक रही थी मेजर की बेटी
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रिपोर्ट : विजय तिवारी

लखनऊ।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात के महज़ 24 घंटे के भीतर सेवानिवृत्त मेजर की बेटी अंजना के मकान से अवैध कब्ज़ा हटाए जाने की कार्रवाई ने प्रशासनिक तत्परता की मिसाल पेश की, लेकिन इस मामले का दूसरा और कहीं अधिक गंभीर पहलू यह है कि पीड़िता को इस त्वरित न्याय से पहले लगभग एक महीने तक पुलिस और प्रशासन के चक्कर लगाने पड़े।

दबंगों ने बीमारी का उठाया फायदा, घर पर किया कब्ज़ा

जानकारी के अनुसार, अंजना गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं और लंबे समय से इलाज के सिलसिले में बाहर रह रही थीं। इसी दौरान चंदौली निवासी बलवंत यादव और उसके साथियों ने कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों के आधार पर उनके मकान पर अवैध कब्ज़ा कर लिया। आरोप है कि घर में तोड़फोड़ की गई, ताले तोड़े गए और कीमती सामान भी गायब कर दिया गया।

6 दिसंबर से थाने-थाने भटकती रहीं अंजना

सबसे अहम तथ्य यह है कि अंजना ने 6 दिसंबर को ही पूरे मामले की शिकायत दर्ज कराई थी। वह ग़ाज़ीपुर थाने से लेकर लखनऊ में पुलिस कमिश्नर कार्यालय तक लगातार न्याय की गुहार लगाती रहीं, लेकिन शुरुआती दौर में न तो एफआईआर दर्ज हुई और न ही कोई प्रभावी कार्रवाई की गई। स्थानीय स्तर पर पुलिस की निष्क्रियता के चलते दबंगों के हौसले और बुलंद हो गए।

सीएम तक पहुंचा मामला, तब हरकत में आया सिस्टम

जब मामला मुख्यमंत्री तक पहुंचा, तो प्रशासनिक मशीनरी में अचानक तेजी आई। सीएम ने पूरे प्रकरण का संज्ञान लेते हुए तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए। इसके बाद पुलिस ने तेजी से कदम उठाते हुए आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज किया, अवैध कब्ज़ा हटवाया और एक आरोपी को गिरफ्तार भी किया।

लापरवाही पर गिरी गाज, चौकी इंचार्ज निलंबित

मामले में सामने आई पुलिस लापरवाही को देखते हुए ग़ाज़ीपुर की सर्वोदयनगर चौकी के इंचार्ज को निलंबित कर दिया गया। यह कार्रवाई इस बात की स्वीकारोक्ति मानी जा रही है कि शुरुआती स्तर पर गंभीर चूक हुई थी, जिसके कारण पीड़िता को महीनों तक न्याय नहीं मिला।

सवालों के घेरे में स्थानीय पुलिस

यह मामला कई अहम सवाल खड़े करता है—

जब शिकायत 6 दिसंबर को ही मिल गई थी, तो कार्रवाई में देरी क्यों हुई?

क्या मुख्यमंत्री तक बात पहुंचती, तभी न्याय मिलता?

स्थानीय पुलिस ने दबंगों के खिलाफ सख्ती पहले क्यों नहीं दिखाई?

24 घंटे की कार्रवाई बनी मिसाल, लेकिन देरी भी उजागर

बेशक, मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद 24 घंटे में हुई कार्रवाई प्रशासन की तत्परता को दर्शाती है, लेकिन उतनी ही सच्चाई यह भी है कि सिस्टम के निचले स्तर की उदासीनता ने एक बीमार महिला को लंबे समय तक दर-दर भटकने पर मजबूर किया।

यह सिर्फ त्वरित न्याय की कहानी नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक देरी और लापरवाही का भी आईना है, जिसने एक पीड़िता की पीड़ा को और बढ़ा दिया। न्याय मिला—लेकिन देर से। अब सवाल यह है कि क्या ऐसे मामलों में बिना “ऊपर तक आवाज़ पहुंचाए” भी समय पर इंसाफ मिल पाएगा?

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