यूपी की सियासत में ‘चोखा–बाटी’ की एंट्री, क्यों बना यह पारंपरिक व्यंजन राजनीतिक संदेश?

रिपोर्ट : विजय तिवारी
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों ‘चोखा–बाटी’ सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि एक राजनीतिक प्रतीक बनकर उभरा है। गांव–कस्बों की थाली से निकलकर यह व्यंजन सियासी मंच तक पहुंच गया है। विपक्षी दलों के कार्यक्रमों, जनसभाओं और सार्वजनिक आयोजनों में चोखा–बाटी के ज़िक्र और वितरण ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है—कि क्या यह जनसरोकारों की आवाज़ है या चुनावी रणनीति का नया तरीका।
कैसे शुरू हुई ‘चोखा–बाटी’ की राजनीति
राजनीतिक हलकों में चर्चा तब तेज़ हुई जब समाजवादी पार्टी से जुड़े कार्यक्रमों में चोखा–बाटी को जनसंवाद के माध्यम के रूप में सामने रखा गया। पार्टी नेताओं ने इसे पूर्वांचल, बुंदेलखंड और ग्रामीण यूपी की लोक-संस्कृति से जोड़ते हुए
आम जनता के जीवन, भोजन और संघर्ष का प्रतीक बताया।
इसके बाद से यह मुद्दा राजनीतिक बयानबाज़ी का केंद्र बन गया।
आम जनता से जुड़ने की कोशिश
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चोखा–बाटी जैसे प्रतीकों के ज़रिये दल ग्रामीण, गरीब और निम्न आय वर्ग तक सीधा संदेश देना चाहते हैं। बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और रोज़मर्रा की समस्याओं के बीच यह संकेत देने की कोशिश है कि राजनीति केवल भाषणों तक सीमित नहीं, बल्कि आम आदमी की थाली से भी जुड़ी है।
विपक्ष का तर्क
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से जुड़े बयानों में कहा गया कि यह पहल किसी का अपमान नहीं, बल्कि स्थानीय खान-पान और सांस्कृतिक पहचान को सम्मान देने का प्रयास है। पार्टी का कहना है कि जब आम जनता की समस्याएं अनसुनी होती हैं, तब प्रतीकों के माध्यम से संवाद स्थापित करना ज़रूरी हो जाता है।
सत्ता पक्ष की प्रतिक्रिया
सत्तारूढ़ दल ने चोखा–बाटी की राजनीति को दिखावटी और भटकाने वाला कदम बताया है। उनका कहना है कि सरकार बुनियादी सुविधाओं, विकास परियोजनाओं और कल्याणकारी योजनाओं पर काम कर रही है, जबकि विपक्ष प्रतीकात्मक आयोजनों से सुर्खियां बटोरना चाहता है। इसी को लेकर दोनों पक्षों के बीच बयानबाज़ी तेज़ हो गई है।
प्रतीकों की राजनीति : नया नहीं है चलन
भारतीय राजनीति में प्रतीकों का इस्तेमाल पहले भी होता रहा है—कभी चौपाल, कभी खाट, कभी साइकिल या लालटेन। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे प्रतीक भावनात्मक जुड़ाव पैदा करते हैं और जटिल मुद्दों को सरल संदेश में बदल देते हैं। यूपी जैसे सांस्कृतिक रूप से विविध राज्य में यह तरीका जल्दी असर दिखाता है।
चुनावी संकेत और राजनीतिक संदेश
आगामी चुनावों को देखते हुए माना जा रहा है कि सभी दल ग्राउंड कनेक्ट मज़बूत करने में जुटे हैं। चोखा–बाटी की राजनीति के ज़रिये
ग्रामीण मतदाताओं तक पहुंच,
महंगाई और जीवन-यापन पर अप्रत्यक्ष सवाल,
स्थानीय परंपराओं को सम्मान देने का संदेश
देने की कोशिश की जा रही है।
‘चोखा–बाटी’ की एंट्री ने यूपी की राजनीति को नया मोड़ दिया है। यह केवल भोजन का मुद्दा नहीं, बल्कि सियासी सोच और रणनीति का प्रतीक बन चुका है। आने वाले समय में यह साफ होगा कि यह प्रयोग सिर्फ चर्चा तक सीमित रहता है या मतदाताओं के फैसले पर भी असर डालता है।




