समाजसेवी सुरेश यादव ने अमर शहीद शशांक तिवारी के चित्र पुष्प अर्पित कर किया नमन

अयोध्या। सिक्किम में अपने साथी सैनिकों की जान बचाते हुए शहीद हुए लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी के शहर के माझवा आवास पर पहुंचकर समाजसेवी संस्थान अयोध्याधाम के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुरेश यादव ने पुष्पांजलि अर्पित कर शोक संवेदना प्रकट किया।
इस दौरान सुरेश यादव ने कहा कि लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी ने जो साहस का परिचय दिया है। वह भुलाया नहीं जा सकता है। शशांक तिवारी राष्ट्र की सेवा करते हुए शहीद हुए। हम उनको नमन करते हैं। उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। उन्होंने कहा कि अमर शहीद शशांक तिवारी के नाम पर उनके घर के सामने बने रोड का नामकरण किया जाना चाहिए। उनके स्मृति में स्टेडियम और स्मारक का जल्द निर्माण होना चाहिए। उन्होंने कहा कि समाजसेवी संस्थान के सभी पदाधिकारी शशांक तिवारी के शहीद होने पर शोक प्रकट करते हैं। हमारी संवेदना उनके परिवार के प्रति है और रहेगी। भाजपा नेता ब्रिजेश त्रिपाठी ने भी जवान शशांक तिवारी के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें नमन और याद किया। इसके साथ ही उनके साहसी कार्य को सराहा। उन्होंने कहा कि महज 22 वर्ष में सेवा में रहते हुए यश और कीर्ति जो शशांक तिवारी ने अर्पित किया। उसे भुलाया नहीं जा सकता। उनके स्मृति में अयोध्या में भव्य स्मारक बनना चाहिए। बाबा संदीपदास उर्फ सूरज, वासुदेव यादव ने भी शोक जताए। इस मौके पर अन्य लोग भी उपस्थित रहे सभी ने शोक संवेदना प्रकट किए।
लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी भारतीय सेना के एक युवा और वीर अधिकारी थे, जिन्होंने 22 मई 2025 को उत्तरी सिक्किम में एक ऑपरेशनल गश्त के दौरान अपने साथी अग्निवीर स्टीफन सुब्बा को तेज धारा वाली नदी में बहने से बचाते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया। उनकी वीरता और समर्पण ने भारतीय सेना के साहस और भाईचारे की भावना को उजागर किया। यहाँ उनके जीवन और करियर के बारे में उपलब्ध जानकारी दी जा रही है:
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
जन्म और परिवार: शशांक तिवारी उत्तर प्रदेश के अयोध्या के गद्दोपुर, मझवा (कौशलपुरी) के निवासी थे। वे अपने माता-पिता के इकलौते पुत्र थे। उनके पिता, जंग बहादुर तिवारी, मर्चेंट नेवी में कार्यरत हैं और वर्तमान में अमेरिका में तैनात हैं। उनकी माँ हृदय रोगी हैं, और उनके परिवार में एक बहन भी है।
शिक्षा: शशांक ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अयोध्या के जिंगल बेल स्कूल से प्राप्त की। उन्होंने 2019 में जेबीए एकेडमी से इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई में हमेशा अव्वल रहने वाले शशांक ने पहले ही प्रयास में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) की प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की।
सैन्य करियर
सेना में शामिल होना: शशांक ने 17 दिसंबर 2024 को भारतीय सेना में कमीशन प्राप्त किया और सिक्किम स्काउट्स रेजिमेंट में लेफ्टिनेंट के रूप में तैनात हुए।
शहादत: 22 मई 2025 को, उत्तरी सिक्किम के छू जंक्शन में एक रूट ओपनिंग पैट्रोल के दौरान, उनका एक साथी जवान तेज धारा वाली नदी में गिर गया। शशांक ने बिना देरी किए नदी में छलांग लगाकर अपने साथी को बचा लिया, लेकिन स्वयं को तेज धारा से नहीं बचा पाए। उनका शव 800 मीटर दूर बरामद हुआ। इस बलिदान ने उनके साहस और अपने जवानों के प्रति कर्तव्यनिष्ठा को दर्शाया।
सम्मान और अंतिम संस्कार
अंतिम संस्कार: शशांक का पार्थिव शरीर अयोध्या लाया गया, जहाँ 24 मई 2025 को जामतारा घाट पर राजकीय और सैन्य सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनके पिता जंग बहादुर ने मुखाग्नि दी।
सम्मान: उनकी वीरता को डोगरा रेजिमेंटल सेंटर और भारतीय सेना ने श्रद्धांजलि दी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी उनके बलिदान को नमन करते हुए उन्हें "अयोध्या का लाल" कहा। साथ ही, उनके परिवार के लिए आर्थिक सहायता और एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की घोषणा की गई।
सामाजिक प्रभाव
शशांक की शहादत ने सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों पर व्यापक चर्चा उत्पन्न की। उनके गाँव और पूरे देश में उनके साहस और बलिदान की सराहना की गई।
उनकी कहानी ने भारतीय सेना के अधिकारियों और जवानों के बीच भाईचारे और कर्तव्यनिष्ठा की मिसाल कायम की।
व्यक्तिगत विशेषताएँ
शशांक अविवाहित थे और अपने परिवार के प्रति गहरी जिम्मेदारी का भाव रखते थे। उनकी वीरता और नेतृत्व ने यह साबित किया कि साहस उम्र की सीमाओं से परे है।
उनकी कहानी को "चेटवुड के आदर्श वाक्य" (भारतीय सैन्य अकादमी का मोटो: "देश की सुरक्षा और सम्मान सर्वोपरि") का जीवंत उदाहरण माना गया।




