लखनऊ: नई तकनीक से बर्जर डिज़ीज़ के मरीज की बचीं दोनों टांगें

उन्नत रेडियोफ्रीक्वेंसी/लेजर एब्लेशन से मिला राहत, डॉक्टर बोले—समय पर इलाज है सबसे बड़ा बचाव
लखनऊ। राजधानी के गोमतीनगर स्थित मिनर्वा सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल में बर्जर डिज़ीज़ से जूझ रहे 45 वर्षीय मरीज को आधुनिक चिकित्सा तकनीक के जरिए नई उम्मीद मिली है। रायबरेली निवासी इस मरीज की हालत इतनी गंभीर हो चुकी थी कि दोनों टांगें काटने की नौबत आ गई थी, लेकिन डॉक्टरों ने उन्नत पेन इंटरवेंशनल तकनीक अपनाकर न सिर्फ दर्द खत्म किया बल्कि उसके पैर भी सुरक्षित रखे।
डॉक्टरों के अनुसार मरीज लंबे समय से मधुमेह और धूम्रपान की लत से ग्रसित था। इसके कारण उसके पैरों में रक्त संचार लगभग रुक गया था और गैंग्रीन तेजी से फैलने लगा था। दाहिने पैर का अंगूठा पहले ही काटना पड़ा था, जबकि संक्रमण आधे पैर तक पहुंच चुका था। बाएं पैर की उंगलियां भी सड़ने लगी थीं और दोनों पैरों में खून की कमी के कारण काले धब्बे उभर आए थे। असहनीय दर्द के चलते मरीज रात भर सो भी नहीं पाता था।
मिनर्वा हॉस्पिटल के रीकंस्ट्रक्शन यूनिट इंचार्ज डॉ. विवेक गुप्ता के मुताबिक यह बीमारी मुख्य रूप से धूम्रपान करने वालों में पाई जाती है। इसमें हाथ-पैर की छोटी रक्त वाहिकाएं सिकुड़ जाती हैं, जिससे खून का प्रवाह बाधित हो जाता है। यदि धमनियों में चर्बी जमने की समस्या भी हो, तो स्थिति और गंभीर हो जाती है। कई मामलों में पारंपरिक दवाओं से राहत सीमित मिलती है और अंत में अंग काटना ही विकल्प रह जाता है।
मरीज की स्थिति को देखते हुए डॉ. विवेक गुप्ता की टीम ने एम्प्यूटेशन के बजाय इंटरवेंशनल पेन मैनेजमेंट तकनीक अपनाने का निर्णय लिया। यह प्रक्रिया डॉ. बृहस्पति तिवारी (पेन एवं स्पाइन फिजिशियन) द्वारा सफलतापूर्वक की गई।
इस प्रक्रिया में पहले दवाओं के जरिए रक्त को नियंत्रित किया गया, फिर एपिड्यूरल तकनीक से दर्द कम किया गया, जिससे रक्त वाहिकाओं का संकुचन घटा। इसके बाद फ्लोरोस्कोपी की मदद से कमर के पास स्थित सिम्पैथेटिक गैंग्लियन पर रेडियोफ्रीक्वेंसी/लेजर एब्लेशन किया गया। यह पूरी प्रक्रिया बिना किसी चीरे के और मरीज को होश में रखते हुए की गई।
इलाज के बाद मरीज में तेजी से सुधार देखने को मिला। दर्द लगभग समाप्त हो गया, गैंग्रीन का फैलाव रुक गया, काले धब्बे धीरे-धीरे ठीक होने लगे और जांच में पैरों में रक्त प्रवाह फिर से शुरू होता दिखा। डॉक्टरों का कहना है कि जिस मरीज के पैर काटने की नौबत थी, वह अब अपने पैरों पर खड़ा होकर सामान्य जीवन की ओर लौट रहा है।
डॉ. बृहस्पति तिवारी ने बताया कि बर्जर डिज़ीज़ में समय पर इलाज बेहद जरूरी है। जितनी जल्दी इस तकनीक से दखल दिया जाए, उतना अधिक क्षेत्र सड़न से बचाया जा सकता है। वहीं डॉ. विवेक गुप्ता ने कहा कि ऐसे मरीजों के लिए यह तकनीक एक प्रभावी विकल्प बनकर उभर रही है।
मरीज की एक महीने बाद सीटी एंजियोग्राफी की जाएगी, ताकि रक्त प्रवाह की स्थिति का आकलन किया जा सके। फिलहाल मरीज को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है और वह दर्द मुक्त है।




