दीनदयाल के सिद्धांतों से भटकी भाजपा, उन्हें भारत रत्न न देना अपमान – दीपक मिश्र

दीनदयाल के पथ से भटकती राजनीति
पंडित दीनदयाल उपाध्याय भारतीय राजनीति के उन विरल चिंतकों में रहे जिन्होंने सत्ता से अधिक विचारों को महत्व दिया। उनका “एकात्म मानवदर्शन” केवल राजनीतिक सिद्धांत नहीं, बल्कि भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था के संतुलित विकास का मार्गदर्शक दर्शन था। किंतु विडंबना यह है कि आज जिन राजनीतिक शक्तियों द्वारा उन्हें अपना आदर्श बताया जाता है, वही उनके मूल विचारों से दूर जाती दिखाई दे रही हैं।
समाजवादी बौद्धिक सभा द्वारा पंडित दीनदयाल उपाध्याय के महाप्रयाण दिवस पर आयोजित संगोष्ठी में प्रख्यात समाजवादी चिंतक और सभा के अध्यक्ष दीपक मिश्र ने इसी विरोधाभास की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान भाजपा अंधपूंजीवाद के प्रभाव में अपने मूल वैचारिक पथ से भटक चुकी है और दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित एकात्म मानवदर्शन तथा राष्ट्रवाद की मूल भावना को पीछे छोड़ दिया है।
दीपक मिश्र के अनुसार, पंडित दीनदयाल को अब तक भारत रत्न न दिया जाना उनके व्यक्तित्व और योगदान की उपेक्षा है। उन्होंने यह भी कहा कि दीनदयाल उपाध्याय जैसे विचारक का सम्मान केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि उनके विचारों को व्यवहार में उतारने से ही संभव है।
संगोष्ठी में दीनदयाल उपाध्याय के जीवन का एक महत्वपूर्ण प्रसंग भी स्मरण किया गया। जब वे जौनपुर से चुनाव लड़ रहे थे, तब उन्होंने ब्राह्मणों के गांव में जाति के नाम पर वोट मांगने से स्पष्ट इनकार कर दिया था। उन्होंने जातिवाद का सहारा लेने की बजाय चुनावी पराजय स्वीकार करना उचित समझा। यह उदाहरण उस नैतिक राजनीति का प्रतीक है जिसकी आज के दौर में अक्सर कमी महसूस होती है।
वक्ताओं ने यह भी कहा कि आज की राजनीति में सादगी, संवाद, सौहार्द और सामाजिक न्याय जैसे मूल्यों का क्षरण हो रहा है। आर्थिक नीतियों के संदर्भ में भी दीनदयाल उपाध्याय की सोच का उल्लेख करते हुए कहा गया कि उनके अनुसार अमीर और गरीब के बीच आय का अंतर सीमित होना चाहिए, जबकि वर्तमान आर्थिक व्यवस्था में विषमता लगातार बढ़ती जा रही है।
संगोष्ठी में भारत रत्न पंडित गोविन्द वल्लभ पंत को भी श्रद्धापूर्वक याद किया गया। वक्ताओं ने चिंता व्यक्त की कि यदि महापुरुषों की विचारधाराएँ केवल स्मरण तक सीमित रह जाएँ और उनके मूल आदर्शों को भुला दिया जाए, तो समाज में असंतुलन बढ़ना स्वाभाविक है।
अंततः वक्ताओं ने जातिवाद, सामाजिक अन्याय, सांप्रदायिकता, अंधपूंजीवाद, केंद्रीकरण, हिंसा और मानवीय विभेद जैसी राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान के लिए व्यापक वैचारिक और सामाजिक आंदोलन की आवश्यकता पर बल दिया।




