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उत्तर प्रदेश

दाऊजी हुरंगे में उमड़ा आस्था, उल्लास और रंगों का सैलाब -घूंघट में आई महिलाओं ने हुरियारों के कपड़े फाड़े, उन्हीं से बनाए कोड़े और प्रेमपूर्वक बरसाए

दाऊजी हुरंगे में उमड़ा आस्था, उल्लास और रंगों का सैलाब -घूंघट में आई महिलाओं ने हुरियारों के कपड़े फाड़े, उन्हीं से बनाए कोड़े और प्रेमपूर्वक बरसाए
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तुलसीराम

मथुरा/बलदेव। ब्रज की होली केवल रंगों का पर्व नहीं बल्कि सदियों पुरानी परंपरा, भक्ति और उल्लास का अद्भुत संगम है। बरसाना की लठमार होली और नंदगांव की हुरियारों वाली होली के बाद ब्रज की सबसे अनोखी और रोमांचकारी परंपरा बलदेव स्थित दाऊजी मंदिर में मनाया जाने वाला प्रसिद्ध हुरंगा है। गुरुवार को आयोजित इस हुरंगे में रंग, भक्ति और उल्लास का ऐसा अद्भुत संगम देखने को मिला कि पूरा मंदिर परिसर रंगों के सागर में डूब गया।

भगवान बलदाऊ जी और माता रेवती के पावन प्रांगण में हजारों श्रद्धालु रंग और भक्ति में सराबोर नजर आए। मंदिर परिसर में बनी विशाल हौदियों में पहले से ही टेसू के फूलों से तैयार चटकीला रंग और निर्मल जल भरा गया था। जैसे ही प्रांगण में रंग की पहली बौछार पड़ी, वैसे ही “दाऊजी महाराज की जय” के जयकारों से पूरा वातावरण गूंज उठा।

हुरंगे की शुरुआत ब्रज के राजा दाऊजी महाराज के प्रतीक स्वरूप रंग खेलने से हुई। इसके बाद पांडेय समाज के लोगों ने हौदियों से बाल्टियों में रंग भरकर एक-दूसरे पर जमकर उड़ेला और उत्सव का आनंद लिया। देखते ही देखते पूरा मंदिर परिसर रंगों की रंगत में सराबोर हो गया।

परंपरा के अनुसार घूंघट में आई महिलाओं ने हुरियारों के कपड़े फाड़ दिए और उन्हीं कपड़ों से कोड़ा बनाकर प्रेमपूर्वक हुरियारों के शरीर पर बरसाए। वहीं हुरियारे भी सखियों पर टेसू का रंग उड़ाते हुए होली गीतों पर झूमते नजर आए। ढोल-नगाड़ों की गूंज, अबीर-गुलाल की उड़ती फुहार और जयकारों के बीच पूरा वातावरण उत्साह और भक्ति से भर उठा।

हुरंगे के दौरान एक अद्भुत दृश्य तब देखने को मिला जब हुरियारे बलराम और कृष्ण की ध्वजा लेकर पूरे उत्साह के साथ मंदिर की परिक्रमा करते नजर आए। परंपरा के अनुसार हुरियारिनें इस ध्वजा को छीनने का प्रयास करती हैं, जबकि हुरियारे उसे बचाने के लिए पूरा जोर लगाते हैं। इस अनोखी रस्म को देखने के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी।

मंदिर परिसर में हर ओर अबीर-गुलाल उड़ रहा था। भजन-कीर्तन की धुनों के बीच लोग होली गीतों पर थिरकते नजर आए। भांग की तरंग और रंगों की उमंग ने माहौल को पूरी तरह मस्ती से भर दिया। इस अनोखी होली के साक्षी बनने के लिए देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचे।

मान्यता है कि जब भगवान कृष्ण पूरे ब्रज में एक महीने तक होली खेलते रहे, तब माता यशोदा ने बड़े भाई बलदेव को उनकी देखरेख के लिए साथ भेजा था। लगातार होली देखने के बाद बलदेव जी का भी मन रंग खेलने को हुआ और उन्होंने यहीं होली खेली। तभी से यह परंपरा चली आ रही है। आज भी यह हुरंगा जेठ और बहू के बीच प्रेमपूर्ण हंसी-मजाक की होली के रूप में खेला जाता है।

खास बातें

कोड़ा मार हुरंगा की अनोखी परंपरा

बलदेव में खेली जाने वाली यह होली कोड़ा मार हुरंगा के नाम से प्रसिद्ध है। महिलाएं हुरियारों के कपड़े फाड़कर उन्हीं से कोड़ा बनाती हैं, जबकि पुरुष हुरियारिनों पर टेसू के रंग की बौछार करते हैं। ढोल-नगाड़ों और होली गीतों के बीच पूरा प्रांगण रंगमय हो जाता है।

टेसू के फूलों से बनता है प्राकृतिक रंग

दाऊजी मंदिर के हुरंगे में परंपरागत रूप से टेसू के फूलों से तैयार प्राकृतिक रंग का उपयोग किया जाता है। हौदियों में पहले से टेसू के फूलों का रंग तैयार किया जाता है, जिसे बाद में बाल्टियों से भर-भरकर एक-दूसरे पर उड़ाया जाता है।

ध्वजा छीनने की परंपरा

हुरंगे के दौरान बलराम और कृष्ण की ध्वजा लेकर हुरियारे मंदिर की परिक्रमा करते हैं। परंपरा के अनुसार हुरियारिनें इस ध्वजा को छीनने का प्रयास करती हैं। इसे उत्साह और हंसी-मजाक की परंपरा माना जाता है।

एक लाख से अधिक श्रद्धालु पहुंचे

दाऊजी के हुरंगे को देखने के लिए हर साल देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस बार भी अनुमानित एक लाख से अधिक लोगों ने मंदिर परिसर में पहुंचकर इस अद्भुत परंपरा का आनंद लिया।

व्यवस्था बेहतर रहने पर लोगों ने की सराहना

दाऊजी महाराज के भव्य हुरंगे में इस बार मंदिर परिसर के अंदर की व्यवस्था पहले से बेहतर रही। बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश पर पाबंदी रखते हुए समाज के लोगों को व्यवस्थित तरीके से प्रवेश दिया गया, जिससे भीड़ नियंत्रण में रही। श्रद्धालुओं ने व्यवस्थाओं की सराहना की।

इस अवसर पर पुलिस प्रशासन के साथ एडवोकेट कुलदीप पांडेय, गोपाल पांडेय (चक्की वाले), विष्णु शास्त्री, पुनीत पांडेय, ब्रजेश बौहरे, बंटी पांडेय सहित समाज के कई लोग मौजूद रहे।

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