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उत्तर प्रदेश

'संविधान के नीति-सिद्धान्तों को मूल अधिकार बनाने से घटेगी सामाजिक असमानता' :पी साईनाथ

संविधान के नीति-सिद्धान्तों को मूल अधिकार बनाने से घटेगी सामाजिक असमानता :पी साईनाथ
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लखनऊ, 14 फरवरी। देश में ग्रामीण पत्रकारिता के जनक कहे जाने वाले रेमन मैगासेसे पुरस्कार से सम्मानित , पूर्व राष्ट्रपति वी वी गिरि के पौत्र वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक पी साईनाथ ने कहा कि आज हमारा देश भयंकर असमानता के दौर से गुजर रहा है। यह असमानता समाज के विभिन्न क्षेत्रों में व्याप्त है। आर्थिक,सामाजिक, लैंगिक भाषाई असमानता देश और समाज के विभिन्न क्षेत्रों को भीतर से खोखला कर रही है। उन्होंने कहा कि जब तक काम का अधिकार, शिक्षा का अधिकार मूल अधिकारों में शामिल नहीं हो जाते असमानता को कम नहीं किया जा सकता। उन्होंने आंकड़े प्रस्तुत करते हुए कहा कि जहां वर्ष 2004 में लोकसभा में 543सांसदों में केवल 30 फीसदी करोड़पति तबके से आते थे। वर्ष 2024 तक आते आते यह संख्या 93 फीसदी तक पहुंच गई। पी साइनाथ 'जन विचार मंच' द्वारा लखनऊ के कैफी़ आज़मी सभागार में आयोजित संगोष्ठी 'असमानता के दौर में मीडिया' में मुख्य वक्ता के तौर पर अपने विचार साझा कर रहे थे । उन्होंने कहा कि एक तरफ चंद धन्ना सेठों के बच्चों की शादी में पैसा पानी की तरह बहाया जाता है,वहीं

महाराष्ट्र में तीन लाख परिवारों ने खुलेआम यह घोषणा की थी कि पैसा न होने की वजह से वह अपने बच्चों की शादी नहीं कर पा रहे थे। उन्होंने कहा कि जहाँ संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जारी मानव विकास रिपोर्ट में भारत 134 वें स्थान पर था वहीं दूसरी तरफ देश में डॉलर अरबपतियों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। उन्होंने बताया कि आज मीडिया और पत्रकारिता दो अलग-अलग चीजें हो गई हैं । जहां पत्रकारिता का धर्म गरीब जनता के मुद्दों को सामने लाना होता था वहीं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के द्वारा मुनाफा कमाना ही अभीष्ट उद्देश्य रह गया है। श्री साईनाथ ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम असमानता के खिलाफ लड़ा गया वहीं आज 2025 में हमारे देश में असमानता ब्रिटिश राज से भी ज्यादा है। श्री साईनाथ ने कहा कि यह असमानता केवल एक नीति का परिणाम नहीं है बल्कि इसके पीछे बहुत सारे कारण जिम्मेदार है। अपनी प्रसिद्ध किताब 'तगड़ा सूखा सबके मन भावे' पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि इस पुस्तक का अनुवाद 12 भारतीय भाषाओं में हो चुका है और 68 संस्करण सामने आ चुके हैं। संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार नवीन जोशी ने कहा कि आज से 3 दशक पूर्व हिंदी अखबारों में 'गाँव

की चिट्ठी' नामक कॉलम छपता था जिसमें गाँव की समस्याएं लोग लिख कर भेजते थे और बाद में उन समस्याओं के आधार पर समाचार प्रकाशित किए जाते थे लेकिन समय के साथ गाँव की समस्या वाली खबरों का स्पेस कम हो गया है। संगोष्ठी में बड़े पैमाने पर नगर के छात्रों, लेखकों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भागीदारी की। प्रमुख रूप से लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति डॉक्टर रूपरेखा वर्मा , प्रोफेसर रमेश दीक्षित , प्रोफेसर नदीम हसनैन, वंदना मिश्र, मधुगर्ग, अंशु केडिया, ऋषि श्रीवास्तव, नवाबुद्दीन, प्रोफेसर सूरज बहादुर थापा, डॉक्टर रीता चौधरी, श्रीमती अवंतिका सिंह, दीपक कबीर, नागेंद्र सिंह, सुहेल वहीद, प्रतिभा कटियार, अनूप मणि त्रिपाठी अजय शेखर सिंह आदि थे। संगोष्ठी का संचालन प्रतुल जोशी ने किया।

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