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उत्तर प्रदेश

प्रयागराज विवाद पर प्रशासन बैकफुट पर, शंकराचार्य से माफी की तैयारी

प्रयागराज विवाद पर प्रशासन बैकफुट पर, शंकराचार्य से माफी की तैयारी
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माघ मेले के टकराव के बाद समाधान की कोशिश तेज, पूर्णिमा पर संगम स्नान की संभावना

रिपोर्ट : विजय तिवारी

प्रयागराज।

माघ मेले के दौरान संगम स्नान और प्रोटोकॉल को लेकर उत्पन्न हुए विवाद के बाद प्रयागराज जिला प्रशासन अब पीछे हटता नजर आ रहा है। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़े इस मामले में प्रशासन अपनी ओर से हुई चूक स्वीकार करने और माफी मांगने की तैयारी में है। सूत्रों के अनुसार विवाद को शांत करने के लिए शासन स्तर पर सक्रिय हस्तक्षेप किया गया है और लखनऊ से वरिष्ठ अधिकारियों को मध्यस्थता की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

प्रशासन की कोशिश है कि संवाद के जरिए गतिरोध समाप्त हो और माघ पूर्णिमा जैसे महत्वपूर्ण स्नान पर्व से पहले संत समाज में असंतोष की स्थिति न बने। बताया जा रहा है कि शासन के दो बड़े अधिकारी शीघ्र ही वाराणसी जाकर शंकराचार्य से मुलाकात करेंगे और उन्हें सम्मान के साथ प्रयागराज लौटने के लिए मनाने का प्रयास करेंगे।

18 जनवरी की घटना से शुरू हुआ विवाद

इस पूरे घटनाक्रम की जड़ 18 जनवरी को मौनी अमावस्या के दिन हुई घटना को माना जा रहा है। उस दिन संगम नोज तक पालकी ले जाने को लेकर शंकराचार्य के शिष्यों और पुलिस-प्रशासन के बीच तीखी बहस हो गई थी। प्रशासन का कहना था कि सुरक्षा कारणों से संगम नोज तक पालकी ले जाने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जबकि शंकराचार्य पक्ष का आरोप था कि उनके शिष्यों के साथ दुर्व्यवहार किया गया और धार्मिक परंपराओं व तय प्रोटोकॉल की अनदेखी हुई।

इस टकराव के बाद शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती अपने शिविर में धरने पर बैठ गए। लगभग 12 दिनों तक चले इस धरने के बावजूद समाधान न निकलने पर उन्होंने बिना संगम स्नान किए माघ मेला छोड़ दिया और वाराणसी प्रस्थान कर गए। उनके इस कदम को प्रशासन के लिए बड़ा झटका माना गया, क्योंकि माघ मेले में संतों की उपस्थिति को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

शंकराचार्य की दो स्पष्ट शर्तें

सूत्रों के मुताबिक शंकराचार्य ने अपनी संभावित वापसी और संगम स्नान को लेकर दो टूक शर्तें रख दी हैं।

पहली शर्त यह है कि जिन अधिकारियों की भूमिका के कारण यह विवाद उत्पन्न हुआ, वे सार्वजनिक रूप से माफी मांगें।

दूसरी शर्त यह है कि संगम स्नान के दौरान चारों शंकराचार्यों के लिए निर्धारित परंपरागत और प्रशासनिक प्रोटोकॉल को पूरी तरह लागू किया जाए।

शंकराचार्य के मीडिया प्रभारी योगीराज सरकार ने भी इस बात की पुष्टि की है कि शासन के अधिकारियों ने उनसे संपर्क किया है और वार्ता की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। हालांकि अंतिम निर्णय अभी नहीं हुआ है।

माघ पूर्णिमा से पहले

प्रशासन पर दबाव

माघ पूर्णिमा माघ मेले का सबसे महत्वपूर्ण स्नान पर्व माना जाता है। इस दिन लाखों श्रद्धालु संगम में स्नान के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में किसी बड़े धार्मिक विवाद का बने रहना प्रशासन के लिए चुनौती बन सकता है। यही कारण है कि सरकार और जिला प्रशासन इस मुद्दे को प्राथमिकता के आधार पर सुलझाने में जुटे हुए हैं।

प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि शंकराचार्य को पूरे सम्मान के साथ प्रयागराज वापस लाने और प्रोटोकॉल के अनुरूप संगम स्नान कराने का भरोसा दिया गया है। यदि दोनों पक्षों के बीच सहमति बनती है तो जल्द ही इस संबंध में आधिकारिक घोषणा हो सकती है।

धर्म, प्रशासन और राजनीति पर छिड़ी बहस

इस पूरे प्रकरण ने धार्मिक और सामाजिक हलकों में व्यापक चर्चा को जन्म दिया है। कुछ लोग इसे संतों के सम्मान और धार्मिक परंपराओं से जुड़ा मामला मान रहे हैं, जबकि कुछ वर्ग इसे प्रशासनिक अनुशासन और सुरक्षा व्यवस्था से जोड़कर देख रहे हैं।

सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं, जिनमें धर्म, प्रशासन और राजनीति की भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

फिलहाल पूरा मामला संवाद और मध्यस्थता के दौर में है। यदि शंकराचार्य की शर्तों पर सहमति बनती है, तो माघ पूर्णिमा पर प्रयागराज में एक बार फिर संत समाज की उपस्थिति और धार्मिक गतिविधियों की रौनक देखने को मिल सकती है। वहीं समाधान न निकलने की स्थिति में यह विवाद और लंबा खिंच सकता है।

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