कर्ज में डूबता भारत, ब्याज में बहता बजट - यह विकास नहीं, पीढ़ियों से विश्वासघात है : दीपक मिश्र

प्रख्यात समाजवादी चिंतक एवं संवैधानिक-संसदीय अध्ययन संस्थान के सदस्य दीपक मिश्र ने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पर तीखा हमला करते हुए कहा है कि केंद्र सरकार का आर्थिक मॉडल देश को समृद्धि नहीं, बल्कि कर्ज और विषमता की दलदल में धकेल रहा है।
उन्होंने कहा कि भारत आज ऐतिहासिक कर्ज संकट की ओर बढ़ रहा है। देश पर 747.2 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज होना और उसका बीते दस वर्षों में 92 प्रतिशत से अधिक बढ़ जाना सरकार की तथाकथित आर्थिक सफलता के खोखलेपन को उजागर करता है। इससे भी अधिक गंभीर तथ्य यह है कि देश का लगभग 20 प्रतिशत बजट केवल ब्याज चुकाने में झोंक दिया जा रहा है, जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक न्याय लगातार हाशिये पर धकेले जा रहे हैं।
दीपक मिश्र ने कहा कि वित्तीय वर्ष 2024-25 के अंत तक देश पर 185.94 लाख करोड़ रुपये का ऋण हो जाना और जीडीपी के मुकाबले कर्ज का बोझ 81.4 प्रतिशत से अधिक पहुंच जाना आर्थिक आत्मनिर्भरता नहीं, बल्कि वित्तीय गुलामी की ओर बढ़ते कदम हैं।
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि यही नीति जारी रही, तो वर्ष 2047 में आज़ादी के सौ साल पूरे होने पर देश की नई पीढ़ी को एक कर्ज़ में डूबा, विषमता से ग्रस्त और परावलंबी भारत विरासत में मिलेगा। यह न केवल शहीदों के सपनों का अपमान होगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के साथ खुला अन्याय भी होगा।
दीपक मिश्र ने केंद्र सरकार से सवाल पूछा कि क्या विकास का अर्थ केवल कर्ज लेकर आंकड़े चमकाना है? क्या बजट जनता के लिए है या कॉरपोरेट और वित्तीय संस्थानों को खुश करने का दस्तावेज़ बन चुका है?
उन्होंने मांग की कि वित्तीय वर्ष 2026-27 का बजट कर्ज बढ़ाने का नहीं, बल्कि कर्ज घटाने का रोडमैप प्रस्तुत करे; विषमता को बढ़ावा देने के बजाय समतामूलक और जन-पक्षीय अर्थव्यवस्था की दिशा में ठोस कदम उठाए।
अंत में उन्होंने कहा कि देश को ऐसे बजट की ज़रूरत है जो नाम मात्र का नहीं, बल्कि वास्तव में निर्मल और रमणीय हो—जो जनता को राहत दे, न कि आने वाली पीढ़ियों को कर्ज की जंजीरों में जकड़ दे।




