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प्रयागराज | आस्था के महासंगम में राजनीति का प्रवेश क्यों? व्यवस्था निभाता प्रशासन, संयम से चूका संत समाज

प्रयागराज | आस्था के महासंगम में राजनीति का प्रवेश क्यों? व्यवस्था निभाता प्रशासन, संयम से चूका संत समाज
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रिपोर्ट : विजय तिवारी

प्रयागराज / उत्तर प्रदेश |

मौनी अमावस्या और माघ मेले जैसे विराट धार्मिक आयोजनों में प्रयागराज की पहचान आस्था, अनुशासन और सेवा से जुड़ी रही है। देश–विदेश से आने वाले श्रद्धालु कठिन परिस्थितियों के बावजूद पैदल चलकर संगम क्षेत्र तक पहुंचते हैं और शांतिपूर्वक आस्था की डुबकी लगाकर अपने गंतव्य की ओर बढ़ जाते हैं। इस व्यापक जनसमूह के सुरक्षित और सुचारु संचालन के लिए पुलिस व मेला प्रशासन लगातार सेवा में तैनात रहता है।

प्रशासन की व्यवस्था और दायित्व

पुलिस एवं प्रशासनिक अमला 24 घंटे ड्यूटी पर रहकर बैरिकेडिंग, पैदल मार्ग, वैकल्पिक रास्तों और नियंत्रित प्रवेश जैसी व्यवस्थाएं लागू करता है। ये नियम किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, बल्कि लाखों श्रद्धालुओं की सुरक्षा, भीड़ प्रबंधन और आपात स्थितियों से निपटने के लिए बनाए जाते हैं। ठंड, थकान और दबाव के बीच भी प्रशासन का उद्देश्य एक ही रहता है—हर श्रद्धालु सुरक्षित रहे और आयोजन की गरिमा बनी रहे।

टकराव का संदर्भ और प्रश्न

इसी व्यवस्था के बीच हालिया घटनाक्रम ने बहस को जन्म दिया। प्रश्न यह है कि जब बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे कई किलोमीटर पैदल चलकर संगम तक पहुंच रहे हैं, तो कुछ मीटर पैदल चलना क्या असंभव था? व्यवस्था का पालन और सहयोग क्या धर्म व संस्कृति की मूल भावना नहीं है? प्रशासन पर उंगली उठाने से पहले इन सवालों पर आत्ममंथन आवश्यक है।

संत समाज से अपेक्षित भूमिका

धर्म और संत परंपरा का आधार विनम्रता, संयम और करुणा रहा है। तीर्थ क्षेत्रों में नोंकझोंक, धक्का-मुक्की या मारपीट न केवल कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती है, बल्कि संत समाज की छवि और तीर्थ की मर्यादा पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है। संतों और उनके अनुयायियों से अपेक्षा रहती है कि वे शांति, धैर्य और सहयोग का संदेश दें—टकराव का नहीं।

वायरल वीडियो और जांच

मौनी अमावस्या के दौरान संगम क्षेत्र से जुड़े वायरल वीडियो ने नया विवाद खड़ा किया है। सोशल मीडिया पर प्रसारित फुटेज में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थकों पर पुलिसकर्मियों व अधिकारियों से उलझने, धक्का-मुक्की और मारपीट के आरोप लगाए जा रहे हैं। आरोप है कि घटनाक्रम को एकतरफा प्रस्तुत कर प्रशासन की छवि धूमिल करने की कोशिश हुई। प्रशासनिक स्तर पर वीडियो की जांच जारी है और तथ्यों के आधार पर ही निष्पक्ष कार्रवाई की बात कही गई है।

पत्रकारिता और जिम्मेदारी

प्रयागराज के प्रिंट व डिजिटल मीडिया से जुड़े पत्रकार दिनेश शुक्ला ने इस प्रकरण पर प्रतिक्रिया देते हुए तीर्थ नगरी की छवि को धूमिल करने को लेकर कड़ी निंदा की। उन्होंने कहा कि धार्मिक आयोजनों में हिंसा, टकराव और राजनीतिक रंग देना न तो कानून-व्यवस्था के हित में है और न ही संत परंपरा की गरिमा के अनुरूप। साथ ही, तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने वाली सामग्री फैलाने को उन्होंने गैर-जिम्मेदाराना बताया और निष्पक्ष पत्रकारिता पर जोर दिया।

तीर्थ क्षेत्र में राजनीति नहीं, सेवा भाव की आवश्यकता

धार्मिक आयोजन स्थल किसी भी परिस्थिति में राजनीतिक मंच नहीं बनना चाहिए। तीर्थ क्षेत्रों में सरकार या प्रशासन को बदनाम करने की कोशिश न केवल अनुचित है, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और व्यवस्था से जुड़े प्रयासों पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है। ऐसे आयोजनों में राजनीति के बजाय सहयोग, समन्वय और सेवा भाव की आवश्यकता होती है।

विशेषज्ञों और सामाजिक वर्गों का मानना है कि प्रदेश और देश की राजनीति के लिए पर्याप्त मंच मौजूद हैं, लेकिन तीर्थ स्थलों पर सभी दलों, संत समाज और जनप्रतिनिधियों को एकजुट होकर प्रशासन के साथ खड़े रहना चाहिए। संकट या दबाव के समय आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि यथाशक्ति सहयोग ही धर्म, संस्कृति और राष्ट्रहित का सच्चा स्वरूप है।

संयम, संवाद और सहयोग ही समाधान

प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि किसी भी पक्ष द्वारा कानून तोड़ने या हिंसा फैलाने के प्रमाण मिलने पर निष्पक्ष कार्रवाई होगी। फिलहाल संगम क्षेत्र में स्थिति नियंत्रण में बताई जा रही है।

तीर्थराज प्रयाग और त्रिवेणी संगम की मर्यादा तभी अक्षुण्ण रह सकती है जब प्रशासन, संत समाज और श्रद्धालु—तीनों परस्पर सम्मान, संयम और सहयोग का पालन करें। टकराव न धर्म का संदेश है, न संस्कृति की पहचान; आत्ममंथन और जिम्मेदार आचरण ही इस पावन आयोजन की सच्ची रक्षा कर सकते हैं।

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