राम मंदिर यात्रा की अटकलों के बीच संत परंपरा की सख्त प्रतिक्रिया, बयान से तेज हुई सियासी और धार्मिक बहस

रिपोर्ट : विजय तिवारी
अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर को लेकर एक बार फिर राजनीति और धर्म से जुड़ा विमर्श केंद्र में आ गया है। कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के संभावित अयोध्या दौरे और राम मंदिर दर्शन की चर्चाओं के बीच संत परंपरा से जुड़े एक प्रमुख धर्माचार्य के बयान ने माहौल को गरमा दिया है। इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों से लेकर साधु-संत समाज तक व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।
धर्माचार्य शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा है कि राहुल गांधी को राम मंदिर में प्रवेश नहीं दिया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि राहुल गांधी ने स्वयं को हिंदू परंपरा के अनुरूप प्रस्तुत नहीं किया है और पूर्व में हिंदू धर्म व आस्था से जुड़े उनके बयानों को लेकर आपत्तियां सामने आती रही हैं। शंकराचार्य ने मंदिर प्रबंधन और ट्रस्ट से अपील करते हुए कहा कि राम मंदिर करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है, इसलिए वहां प्रवेश उन्हीं को मिलना चाहिए जो हिंदू धर्म की मान्यताओं और परंपराओं का सम्मान करते हों।
इस बयान के बाद अयोध्या समेत अन्य धार्मिक क्षेत्रों में संतों और महंतों की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। संत समाज का एक वर्ग इस विचार का समर्थन करते हुए मानता है कि मंदिर किसी भी प्रकार के राजनीतिक प्रदर्शन या संदेश का मंच नहीं होना चाहिए। उनका कहना है कि मंदिर की मर्यादा और धार्मिक अनुशासन सर्वोपरि है, इसलिए प्रवेश से जुड़े नियम आस्था और परंपरा के आधार पर तय होने चाहिए।
हालांकि, संत समाज के भीतर इस मुद्दे पर पूरी एकरूपता नहीं दिख रही है। कुछ संतों का मानना है कि मंदिर दर्शन व्यक्ति की निजी आस्था से जुड़ा विषय है और इसे राजनीतिक विवाद का रूप नहीं देना चाहिए। उनका तर्क है कि किसी की आस्था पर सार्वजनिक रूप से सवाल खड़े करना सामाजिक सौहार्द और धार्मिक समरसता के लिए उचित नहीं है।
इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि तब बनी, जब बाराबंकी से कांग्रेस सांसद तनुज पुनिया ने एक प्रेस वार्ता में राहुल गांधी के अयोध्या आने और राम मंदिर दर्शन की संभावना जताई। इसके बाद यह विषय तेजी से चर्चा में आ गया और विभिन्न राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगीं, जिससे यह मुद्दा धीरे-धीरे राष्ट्रीय बहस का रूप लेने लगा।
इसी क्रम में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने सामाजिक और धार्मिक जीवन से जुड़े एक अन्य विषय पर भी टिप्पणी की। उन्होंने सोशल मीडिया पर चर्चित चेहरा हर्षा रिछारिया को लेकर कहा कि संत जीवन त्याग, संयम और साधना का मार्ग है, न कि प्रसिद्धि या आर्थिक लाभ का साधन। उनका कहना था कि धर्म के क्षेत्र में प्रवेश करने वाले लोगों को यह स्पष्ट समझ होनी चाहिए कि यह मार्ग सांसारिक आकर्षणों से अलग है।
गौरतलब है कि हर्षा रिछारिया ने हाल ही में सोशल मीडिया के माध्यम से यह जानकारी दी कि वह फिलहाल धर्म मार्ग पर चलने के अपने निर्णय को विराम दे रही हैं। उन्होंने आर्थिक और निजी परिस्थितियों का हवाला देते हुए अपने पूर्व पेशे की ओर लौटने का फैसला किया है। इसके बाद संत समाज और आम लोगों के बीच यह बहस भी तेज हो गई है कि आधुनिक समय में आस्था, आजीविका और सार्वजनिक पहचान के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
राहुल गांधी की संभावित अयोध्या यात्रा, संत परंपरा के कड़े बयान और उससे जुड़ी प्रतिक्रियाओं ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आस्था, राजनीति और सार्वजनिक जीवन की सीमाएं कहां तय होनी चाहिए। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर चर्चाएं और तेज होने की संभावना जताई जा रही




