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माघ मेले में अस्थायित्व के बीच स्थायित्व की मिसाल : झूसी पुल के नीचे बाबा रामदास की तपोभूमि

माघ मेले में अस्थायित्व के बीच स्थायित्व की मिसाल : झूसी पुल के नीचे बाबा रामदास की तपोभूमि
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रिपोर्ट : विजय तिवारी

प्रयागराज, माघमेला।

संगम की रेती पर जहां हर वर्ष माघ मेले के साथ असंख्य पंडाल जन्म लेते हैं और मेला समाप्त होते ही इतिहास बन जाते हैं, वहीं झूसी पुल के नीचे स्थित बाबा रामदास का पंडाल समय, परिस्थितियों और प्रकृति—तीनों से संघर्ष करते हुए आस्था की अमिट कहानी लिख रहा है। यह केवल एक पंडाल नहीं, बल्कि तप, साधना और गुरु-शिष्य परंपरा की जीवंत धरोहर है।

इस पंडाल के सूत्रधार हैं देवरहा बाबा के परम शिष्य महंत रामदास। कहा जाता है कि देवरहा बाबा की कृपा और आदेश से महंत रामदास ने संगम तट पर इस अखंड साधना स्थल की स्थापना की। गुरु की दीक्षा और आशीर्वाद को जीवन का ध्येय मानकर उन्होंने यहां सेवा, साधना और सनातन परंपरा को निरंतर प्रवाहित रखा।

अखंड ज्योति : तप की प्रतीक

इस पंडाल की सबसे बड़ी पहचान है चार मंजिला ऊंची अखंड ज्योति, जो बीते करीब 20 वर्षों से लगातार प्रज्ज्वलित है। आंधी, तूफान, मूसलाधार वर्षा और संगम की विकराल बाढ़—सब इसके साक्षी बने, लेकिन न ज्योति बुझी, न आस्था डगमगाई। स्थानीय लोगों का मानना है कि यह ज्योति केवल अग्नि नहीं, बल्कि साधना की ऊर्जा है, जो संगम की पवित्र धरती को निरंतर आलोकित कर रही है।

बाढ़ में भी अडिग आस्था

हर वर्ष गंगा और यमुना के जलस्तर में वृद्धि संगम क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौती होती है। कई बार पानी पंडाल की देहरी तक आ पहुंचता है, लेकिन बाबा रामदास का यह साधना स्थल आज तक अडिग खड़ा है। बाढ़ के समय शिष्यों और श्रद्धालुओं द्वारा दिन-रात सेवा कर पंडाल और अखंड ज्योति की रक्षा की जाती है। यही कारण है कि यह स्थान संघर्ष में तपकर और भी दृढ़ होता गया।

सेवा, साधना और श्रद्धा

माघ मेले के दौरान देश-विदेश से आने वाले कल्पवासी, संत और श्रद्धालु यहां दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं। यहां भजन, सत्संग, ध्यान और सेवा का वातावरण बना रहता है। मान्यता है कि अखंड ज्योति के दर्शन से मानसिक शांति, आत्मबल और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। कई श्रद्धालु इसे जीवन में दिशा देने वाला स्थल मानते हैं।

सनातन परंपरा का जीवंत प्रतीक

साधु-संतों के अनुसार, यह पंडाल उस सनातन परंपरा का प्रतीक है जिसमें गुरु-शिष्य संबंध, निरंतर साधना और सेवा सर्वोपरि होती है। बदलते समय और आधुनिक व्यवस्थाओं के बीच यह पंडाल याद दिलाता है कि आस्था यदि सच्ची हो, तो अस्थायी संसार में भी स्थायित्व संभव है।

प्रयागराज के संगम तट पर स्थित बाबा रामदास का यह पंडाल माघ मेले की भीड़ में एक अलग ही अध्याय लिखता है—

जहां रेती पर खड़ी साधना, बहते जल के बीच भी अडिग रहती है और अखंड ज्योति आने वाली पीढ़ियों को आस्था की राह दिखाती रहती है।

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