गोरवा में सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा संपन्न, सात दिनों में श्रीमद् भागवत कथा ने बताया धर्म, भक्ति और लोककल्याण का सम्पूर्ण दर्शन

रिपोर्ट : विजय तिवारी
वडोदरा (गुजरात)।
गोरवा क्षेत्र स्थित सहयोग गार्डन परिसर में श्री कृष्ण सेवा समिति चैरिटेबल ट्रस्ट (राजेश पाठक एवं समस्त सहभागी) के तत्वावधान में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन आध्यात्मिक अनुशासन, शास्त्रीय मर्यादा और व्यापक श्रद्धालु सहभागिता के साथ संपन्न हुआ।
कथा वाचन पूज्य श्री प्रशान्त जी महाराज द्वारा किया गया, जिसमें गीता और भागवत—दोनों के सिद्धांतों का संतुलित समन्वय देखने को मिला।
प्रथम दिवस : भागवत महात्म्य और श्रवण का महत्व
कथा के पहले दिन श्रीमद् भागवत पुराण के महात्म्य का विवेचन किया गया।
राजा परीक्षित और शुकदेव संवाद के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया कि—
भागवत केवल कथा नहीं, आत्मशुद्धि का मार्ग है
श्रवण ही भक्ति की प्रथम साधना है
अहंकार ज्ञान का सबसे बड़ा अवरोध है
यह दिन श्रद्धालुओं को कथा सुनने की मानसिक और आध्यात्मिक तैयारी की ओर ले गया।
द्वितीय दिवस : सृष्टि तत्व, अवतार भावना और कपिल उपदेश
दूसरे दिन सृष्टि रचना, कालचक्र और अवतार तत्व का वर्णन हुआ।
कपिल मुनि द्वारा देवहूति को दिए गए उपदेशों के माध्यम से—
भक्ति और ज्ञान का सामंजस्य
वैराग्य का वास्तविक अर्थ
इंद्रिय संयम का महत्व
स्पष्ट किया गया।
यह दिन दार्शनिक स्पष्टता का आधार बना।
तृतीय दिवस : भक्त चरित्र और ईश्वर की करुणा
तीसरे दिन भक्त प्रह्लाद, ध्रुव और नरसिंह अवतार के प्रसंग आए।
कथा का केंद्रीय संदेश रहा—
सच्ची भक्ति परिस्थितियों से परे होती है
ईश्वर अपने भक्त की रक्षा के लिए स्वयं प्रकट होते हैं
अत्याचार का अंत निश्चित है
यह दिवस अडिग विश्वास और साहस को समर्पित रहा।
चतुर्थ दिवस : श्रीकृष्ण जन्म और बाल लीलाएँ
चौथे दिन श्रीकृष्ण जन्म, वासुदेव-देवकी की पीड़ा, यशोदा मैया का वात्सल्य और बाल लीलाओं का वर्णन हुआ।
मुख्य प्रसंग रहे—
जन्म का उद्देश्य : अधर्म का नाश
कालिय नाग दमन
पूतना वध
माखन लीला
यह दिन ईश्वर के सुलभ और करुण स्वरूप को दर्शाता है।
पंचम दिवस : गोवर्धन, रासलीला और गोपी भक्ति
पांचवें दिन गोवर्धन पूजा और रासलीला के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया कि—
अहंकार चाहे देवताओं का हो, उसका नाश निश्चित है
गोपियों का प्रेम सांसारिक नहीं, आत्मिक है
भक्ति में अधिकार नहीं, समर्पण होता है
यह दिन भागवत भक्ति परंपरा का शिखर माना गया।
षष्ठम दिवस : मथुरा प्रस्थान, कंस वध और विवाह उत्सव
छठे दिन कथा ने निर्णायक मोड़ लिया।
मुख्य घटनाक्रम—
मथुरा प्रस्थान और बृज का विरह
राधा का मौन : प्रेम की पराकाष्ठा
मुष्टिक–चाणूर वध
कंस वध और अधर्म का अंत
देवकी–वासुदेव की मुक्ति
उग्रसेन की पुनः राजगद्दी
गुरु संदीपनि ऋषि की सेवा
श्रीकृष्ण–रुक्मिणी विवाह उत्सव
यह दिन कर्तव्य, करुणा और सामाजिक मर्यादा का प्रतीक बना।
सप्तम दिवस : द्वारिका आगमन, राजधर्म और मंगल समापन
सातवें दिन कथा का केंद्र द्वारिकाधीश का द्वारिका आगमन रहा।
कथा में वर्णित—
समुद्र तट पर सुव्यवस्थित द्वारिका नगरी
प्रजा का विश्वासपूर्ण स्वागत
नीति, न्याय और लोककल्याण आधारित शासन
यह गीता के लोकसंग्रह सिद्धांत का सजीव उदाहरण रहा।
समापन उपदेश में कहा गया—
धर्म का लक्ष्य युद्ध नहीं, शांति है
शक्ति का प्रयोग व्यवस्था के लिए होना चाहिए
भक्ति, कर्म और ज्ञान—तीनों का संतुलन आवश्यक है
इसके पश्चात मंगल आरती और हरिनाम संकीर्तन के साथ कथा का विधिवत समापन हुआ।
आगामी आयोजन
“दिनांक 01 फ़रवरी 2025, रविवार को प्रातः 10 बजे कलश विसर्जन एवं वैदिक यज्ञ–हवन की पूर्णाहुति के उपरांत विशाल भंडारे का आयोजन संपन्न होगा।”




