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चंद्रग्रहण की वजह से होली की तिथि को लेकर पंचांगभेद : 2 मार्च को होलिका दहन, सूतक और रंग खेलने की तिथि पर क्या कहते हैं ज्योतिषाचार्य

चंद्रग्रहण की वजह से होली की तिथि को लेकर पंचांगभेद : 2 मार्च को होलिका दहन, सूतक और रंग खेलने की तिथि पर क्या कहते हैं ज्योतिषाचार्य
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रिपोर्ट : विजय तिवारी

लखनऊ , नई दिल्ली।

फाल्गुन महीने का सबसे प्रमुख और उल्लासपूर्ण पर्व मानी जाने वाली होली इस वर्ष खगोलीय घटनाओं के कारण चर्चा में है। कारण है उसी अवधि में पड़ने वाला चंद्र ग्रहण के समय और फाल्गुन पूर्णिमा की तिथि के कारण देश के विभिन्न पंचांगों और ज्योतिषाचार्यों के बीच होलिका दहन और रंग खेलने की तिथि को लेकर मतभेद देखने को मिल रहा है। हालांकि अधिकांश विद्वानों का मत है कि धार्मिक परंपरा के अनुसार 2 मार्च को होलिका दहन किया जाएगा, जबकि रंगों की होली अगले दिन मनाई जाएगी।

फाल्गुन पूर्णिमा और होलिका दहन का महत्व

हिंदू पंचांग के अनुसार होली का पर्व फाल्गुन पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन रात के समय होलिका दहन की परंपरा है, जिसे बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। देश के कई हिस्सों में होलिका दहन से पहले पूजा-अर्चना, अनाज और नई फसल की बालियों को अग्नि में अर्पित करने की परंपरा भी निभाई जाती है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार होलिका दहन के बाद अगले दिन रंगों के साथ होली खेली जाती है। यह दिन सामाजिक सद्भाव, भाईचारे और उत्सव का प्रतीक माना जाता है।

चंद्रग्रहण और सूतक का प्रभाव

इस बार फाल्गुन पूर्णिमा के दिन चंद्रग्रहण पड़ने के कारण धार्मिक अनुष्ठानों के समय को लेकर विशेष चर्चा हो रही है। ज्योतिषीय परंपरा के अनुसार चंद्रग्रहण से लगभग 9 घंटे पहले सूतक काल शुरू हो जाता है। इस अवधि में मंदिरों के पट बंद रखने, पूजा-पाठ, यज्ञ, हवन और अन्य मांगलिक कार्यों से बचने की सलाह दी जाती है।

हालांकि विद्वानों का कहना है कि सूतक काल में जप, ध्यान, मंत्रस्मरण और ईश्वर की आराधना करना शुभ माना जाता है। ग्रहण समाप्त होने के बाद स्नान, दान और घर की शुद्धि की परंपरा भी प्रचलित है।

क्यों हो रहा है पंचांगों में मतभेद

खगोल गणनाओं के आधार पर ग्रहण का समय और पूर्णिमा की तिथि अलग-अलग पंचांगों में थोड़े अंतर के साथ बताई जाती है। इसी वजह से कुछ पंचांगों में होलिका दहन के मुहूर्त और रंग खेलने की तिथि को लेकर भिन्न मत सामने आए हैं।

कुछ ज्योतिषाचार्यों का मानना है कि ग्रहण के प्रभाव को देखते हुए होलिका दहन के समय का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है, जबकि अधिकांश विद्वान मानते हैं कि पूर्णिमा की रात होलिका दहन की परंपरा को ही प्रमुखता दी जानी चाहिए।

सूतक काल में क्या करें और क्या न करें

धार्मिक परंपराओं के अनुसार सूतक काल में कुछ सावधानियां बरतने की सलाह दी जाती है:

पूजा, हवन और मांगलिक कार्यों से परहेज किया जाता है

भोजन बनाने या खाने से बचने की परंपरा बताई जाती है

गर्भवती महिलाओं को विशेष सावधानी रखने की सलाह दी जाती है

मंत्र जप, ध्यान और भगवान का स्मरण करना शुभ माना जाता है

ग्रहण समाप्त होने के बाद स्नान और दान का विशेष महत्व बताया गया है

होली पर्व की पौराणिक कथा

होलिका दहन की परंपरा पौराणिक कथा से जुड़ी मानी जाती है। मान्यता के अनुसार दैत्यराज हिरण्यकश्यप के अत्याचारों के बीच भगवान विष्णु के भक्त प्रहलाद को बचाने के लिए अग्नि में बैठी उसकी बहन होलिका जलकर भस्म हो गई, जबकि प्रहलाद सुरक्षित रहे। इस घटना को आस्था और धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है।

उत्सव और सामाजिक महत्व

देश के अलग-अलग क्षेत्रों में होली अलग-अलग परंपराओं के साथ मनाई जाती है। कहीं होलिका दहन के बाद नई फसल का स्वागत किया जाता है, तो कहीं रंगों और गुलाल के साथ सामूहिक उत्सव आयोजित होते हैं।

इस वर्ष चंद्रग्रहण के कारण तिथि को लेकर कुछ मतभेद भले ही सामने आए हों, लेकिन धार्मिक परंपराओं के अनुसार श्रद्धालु अपने स्थानीय पंचांग और विद्वानों की सलाह के आधार पर होली के पर्व की तैयारियों में जुटे हुए हैं।

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