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कहानी : पगली

कहानी : पगली
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लेखक : गोलेन्द्र पटेल

कस्बे की वह सुबह साधारण थी, पर उसकी नियति में एक असाधारण कथा लिखी जा रही थी। धूल भरी गलियों, छोटे-छोटे घरों और रोज़मर्रा की जद्दोजहद के बीच एक लड़की थी, सब उसे “पगली” कहते थे। उसका असली नाम जैसे समय की धूल में कहीं दब गया था। बिखरे बाल, मैले कपड़े और आँखों में एक अजीब-सी मासूम चमक; वह इस दुनिया में होकर भी जैसे उससे अलग थी।

बचपन से ही उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी। वह कभी हँसती, कभी बिना कारण रो पड़ती, तो कभी किसी अनजानी धुन पर खो जाती। समाज ने उसे समझने की कोशिश कम और ठुकराने की आदत अधिक पाल ली थी।

एक दिन वह बाजार की ओर भटकते-भटकते एक साइकिल की दुकान के पास जा पहुँची। वहाँ कई साइकिलें खड़ी थीं, कुछ नई, कुछ पुरानी। उसकी नजर एक पुरानी लेकिन सुंदर साइकिल पर ठहर गई। उसे लगा जैसे वह साइकिल उसे बुला रही हो। वह धीरे-धीरे उसके पास गई, हैंडल पकड़ा और बिना किसी भय या अपराध-बोध के उसे लेकर चल पड़ी।

उसके लिए यह कोई चोरी नहीं थी, वह तो बस एक आकर्षण था, एक अनजाना अपनापन।

घर पहुँचकर उसने साइकिल को आँगन में खड़ा कर दिया। परिवार वालों ने देखा तो चौंक पड़े।

“यह साइकिल कहाँ से लाई?”

पगली ने भोलेपन से उत्तर दिया, “मुझे नहीं मालूम…”

उसके उत्तर में न छल था, न डर, सिर्फ एक सच्चाई थी, जिसे कोई समझना नहीं चाहता था।

साइकिल कई दिनों तक वहीं खड़ी रही। कभी वह उसे छूकर मुस्कुरा देती, कभी यूँ ही उसे घूरती रहती। लेकिन एक दिन जैसे उसके भीतर कुछ बदला। वह साइकिल को लेकर फिर उसी दुकान की ओर चल पड़ी।

संयोग से उसी समय उस साइकिल की असली मालकिन वहाँ आ गई। उसने साइकिल को पहचान लिया और तुरंत अपने बड़े भाई को बुला लाई।

भाई का व्यक्तित्व दबंग था। मजबूत शरीर, ऊँची आवाज़, और अपने सामर्थ्य का अहंकार। देखते ही देखते भीड़ जमा हो गई। सबकी नजरें उस पगली पर टिक गईं, कोई उसे घूर रहा था, कोई फुसफुसा रहा था, तो कोई तमाशा देख रहा था।

अमीर युवक गुस्से में चिल्लाया,

“यही है चोर! मेरी बहन की साइकिल चुरा ली इसने!”

भीड़ में कुछ लोग उसकी बात का समर्थन करने लगे। कुछ के मन में पगली की असहायता का फायदा उठाने के कुत्सित विचार भी जन्म लेने लगे।

तभी पास के मजदूर और कर्मचारी भी वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने स्थिति को समझने की कोशिश की। उनमें से एक बुजुर्ग मजदूर आगे बढ़ा और बोला,

“अरे, यह तो वही लड़की है… बेचारी ठीक नहीं है दिमाग से।”

उन्होंने पगली को भीड़ से बचाया और धीरे-धीरे उसे उसके घर पहुँचा दिया।

समय बीत गया, लेकिन घटना की छाया बनी रही।

कुछ दिनों बाद पगली अपने परिवार के साथ खेत की ओर जा रही थी। धान के छोटे-से खेत, चारों ओर हरियाली और कच्चे रास्ते, यह उसका अपना संसार था। परिवार के लोग अपनी-अपनी साइकिलों पर थे और वह भी उसी साइकिल के साथ चल रही थी।

तभी किसी ने आकर खबर दी,

“जिनकी साइकिल है, वे लोग गाड़ियों में आ रहे हैं!”

यह सुनते ही पगली के मन में डर समा गया। वह घबरा गई। उसने चारों ओर देखा और जल्दी-जल्दी साइकिल को पास के पानी भरे गड्ढे में छिपाने लगी। उस गड्ढे में कमल और कुमुदिनी खिले हुए थे, प्रकृति की सुंदरता के बीच उसका भय और भी गहरा लग रहा था।

तभी चार पहिया गाड़ियाँ आकर रुकीं। अमीर परिवार के लोग उतर पड़े। उनके चेहरे पर गुस्सा और अधिकार का भाव था।

कुछ ही क्षणों में पगली का परिवार भी वहाँ पहुँच गया। माहौल तनावपूर्ण हो गया।

अमीर युवक ने फिर चिल्लाकर कहा,

“यही है वह लड़की! चोर है यह!”

यह सुनते ही पगली का भाई तिलमिला उठा। उसने आगे बढ़कर उसे एक तमाचा जड़ दिया और दृढ़ स्वर में बोला,

“पहले इंसान बनना सीखो! धन से संस्कार नहीं खरीदे जाते।”

भीड़ सन्न रह गई।

उसने सबकी ओर देखते हुए कहा,

“तुम लोग इसे चोर कह रहे हो, पर कभी यह जानने की कोशिश की कि इसने ऐसा क्यों किया?”

भीड़ में खामोशी छा गई, लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं था।

तब उसने अमीर परिवार की माँ को आगे बुलाया।

“माँ, आप आइए… और मेरी बात सुनिए।”

माँ आगे आई। उसके चेहरे पर कठोरता नहीं, करुणा थी।

पगली के भाई ने शांत स्वर में अपनी बहन की पूरी कहानी सुनाई, उसका बचपन, उसकी मानसिक अवस्था और उसका निष्कपट मन। फिर उसने विनम्रता से कहा,

“माँ, बस आज के लिए इसे अपनी बेटी मान लीजिए।”

माँ की आँखें भर आईं। उसने धीरे से अपने पर्स से कुछ पैसे निकाले और पगली के हाथ में रख दिए। फिर उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली,

“बेटी…”

यह शब्द सुनते ही पगली की आँखों में एक अनजानी चमक आ गई। शायद उसने पहली बार अपने लिए स्नेह का यह रूप महसूस किया था।

उस क्षण जैसे दो दुनिया अमीर और गरीब, एक हो गईं। वहाँ न कोई ऊँच-नीच थी, न आरोप-प्रत्यारोप, सिर्फ मानवता थी।

पगली मुस्कुरा रही थी। उसके चेहरे पर एक शांति थी, जैसे उसे अपना स्थान मिल गया हो।

यह कथा केवल एक लड़की की नहीं, बल्कि उस संवेदना की है, जो आज भी इस समाज में कहीं जीवित है। यह हमें याद दिलाती है कि सच्ची सभ्यता धन, शक्ति या प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि उस करुणा में बसती है, जो एक अनजाने को भी अपना बना ले।

ऐसी मातृत्व-भावना और मानवता को बार-बार प्रणाम।

★★★

कहानीकार : गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

संपर्क सूत्र :-

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : [email protected]

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