Home > राज्य > उत्तर प्रदेश > पेट और पाकिस्तान की राशि एकही है, बिना गोली खाये हरामखोर बात नहीं सुनते
पेट और पाकिस्तान की राशि एकही है, बिना गोली खाये हरामखोर बात नहीं सुनते
BY Anonymous21 Jan 2018 1:49 PM GMT

X
Anonymous21 Jan 2018 1:49 PM GMT
मियाज गजबज है ए डार्लिन! एक तो ई ससुर पेट है कि परसों से ही सीजफायर तोड़ रहा है। दिन भर प्रेम से चूरन खाते रहे, पर इस लतखोर पर कवनो फरक नहीं पड़ा। पेट और पाकिस्तान की राशि एकही है, बिना गोली खाये हरामखोर बात नहीं सुनते। शाम को जब एंटीबायटिक की बड़की गोली खाये तब जा के ममिला कंट्रोल हुआ। पर कहते हैं कि जब कांग्रेस की किस्मत खराब हो तो दिग्विजय को चुप कराओ तो अय्यर बोलने लगता है। पेट कमबख्त तनिसुक ठीक हुआ, तबतक पता चला कि स्कूल वाली गाड़ी को RTO वाले पकड़ ले गए, इन्सुरेंस और फिटनेश एक ही साथ फेल हो गए थे। मास्टर की किस्मत में फेल ही फेल लिखा होता है। कभी बच्चे फेल होते हैं, कभी तनख्वाह बिना इन्सुरेंस का क़िस्त फेल होता है, कभी गाड़ी का फिटनेश फेल होता है, और अगर गलती से भी प्यार हुआ तो वह भी सौ फीसदी फेले होता है। अब कौन लड़की आठ महीना पर तनख्वाह पाने वाले मास्टर से प्यार करे भला? बाहुबली देख कर तम्मना भाटिया इस्टाइल वाला झुमका मांगने पर बेचारा प्रेमी मास्टर जब तक पइसा का बेवस्था करता है तबतक बाहुबली2 आ गयी रहती है, और अनुष्का के आगे तम्मना मायावती लगने लगती है। अब कौन बेचारी लड़की ऐसा रिस्की प्रेम करे?
हां तो जब गाड़ी पकड़ाया तो मोतीझील वाले बाबा पहुँचे डीटीओ ऑफिस। वहां पहुँचने पर शरद पवार जइसे स्मार्ट, और कमाल खान जइसे सभ्य अधिकारी से पाला पड़ा जिसने तीन बार बाबा को "तुम" कह कर सम्बोधित किया। फिर का था, बाबा के अंदर का सोया हुआ व्यंगकार दिल्ली वाले चार जज साहबों की अंतरात्मा की तरह जाग गया, और बाबा मुस्किया के बोले- सर! आप तो बड़ा मीठा बोलते हैं, बचपन मे बकरी चराये थे क्या?
बाबा ने व्यंग तो मार दिया, पर फल ई हुआ कि सरवा आठ हजार से चवन्नी कम नहीं किया, और बाबा आठ हजार फाइन दे कर 'किसान' जैसा मुह बना कर लौट आये।
आठ हजार की चपत लगने से मुह तो अइसही आडवानी हुआ था, तबतक इआद आया कि आज नीतीश भाई ने आदेश दिया है कि दहेजबन्दी और बालविवाह बन्दी के लिए लाइन में खड़ा होना है। मुझे अपनी ही एक पुरानी गजल याद आई-
किसी की देह बिकती है, किसी का काम बिकता है,
इस बाजार में कुछ हैं के जिनका नाम बिकता है।
यह जम्हूरियत भी है परिष्कृत रूप मंडी का,
कभी गुजरात बिकता है, कभी आसाम बिकता है।
नीतीशो भाई बेचिये रहे हैं।
पिछलकी बार शराबबंदी का समोसा तनि अधिके बेचा गया, सो इस बार दहेज उन्मूलन का दहीबड़ा ले कर आ गए। सोचा कि पिछली फिलम हिट हो गयी तो क्यों न सीक्वलो बना लें।
पर भइया! एक साल में ही सगरी रंग उतर गया है। जनता ने शराबबंदी को फेल होते देखा है। पिछली नौटंकी का बस अतने लाभ हुआ कि जवन पियक्कड़ पहिले बीस रुपया में पी के बिरजाभार गाने लगता था, उ अब सौ रुपया में पीता है फिर भी कोंई-कांय नहीं करता है। ई बीच वाला अस्सी रुपइया किसके जेब मे जा रहा है, ई भी लोग देखिये रहे हैं। सो इस बार की नौटंकी फाइनल फेल हो गयी। पिछला बार तीन तीन गो लाइन लगाने पर भी आदमी बढ़ गए थे, अबकी एक्को गो लाइन पूरा नहीं हुआ। मतलब मास्टर बेचारा यहां भी फेल।
उहवाँ से लवट के आये तो इस्कूल का लइका सब सुरसती पूजा के तइयारी में झोंक दिया। साँझ को काम ओराया, तो हरामखोर पेट फिर सीजफायर तोड़ने लगा है।
यह गधा कन्या राशि वाला पेट ससुरा मानेगा नहीं। भगवान जाने का होगा.....
सर्वेश तिवारी श्रीमुख
Next Story