किसानवादी लोहिया: सत्ता, समाज और संघर्ष की आवाज

डॉ. राममनोहर लोहिया की 116वीं जयंती पर विशेष लेख -
किसानवादी लोहिया
गिरजाशंकर कुशवाहा 'कुशराज'
स्वदेश यादव
(झाँसी - बुन्देलखण्ड निवासी लेखकद्वय शोधार्थी और छात्रनेता हैं।)
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आज 23 मार्च को भारत के महान दार्शनिक, समाजवादी - किसानवादी विचारक, राजनीतिज्ञ, विश्व सरकार और सप्त क्रांति की अवधारणा के प्रतिपादक डॉ. राममनोहर लोहिया जी की 116वीं जयंती है। 23 मार्च सन 1910 में डॉ. लोहिया जी का जन्म अवध क्षेत्र में अयोध्या (फैजाबाद) जिले के अकबरपुर में हुआ था। तत्कालीन विंध्य प्रदेश (बुंदेलखंड - बघेलखंड राज्य) के रीवा में सन 1950 की 26 फरवरी को आयोजित हिन्द किसान पंचायत के प्रथम राष्ट्रीय अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए डॉ. लोहिया जी ने अपने भाषण में भारतीय किसान की दशा और दिशा पर विचार करते हुए किसान कल्याण की युगान्तकारी योजना प्रतिपादित की।
हिन्द किसान पंचायत के इस राष्ट्रीय अधिवेशन में भारत देश के कोने-कोने से किसान और किसान प्रतिनिधि सम्मिलित हुए थे। जिसकी किसान आंदोलनों और किसान संगठनों के संचालन में युगान्तकारी भूमिका रही। डॉ. लोहिया जी ने अध्यक्षीय उद्बोधन में किसानों की राजनीति में सक्रियता पर विचार करते हुए कहा था - "राजनीति में किसानों का स्थिर और सतत प्रभाव रहे। यह हममें से अनेक का स्वप्न रहा है। इसमें संदेह नहीं कि किसानों ने प्रायः अनेक बार विद्रोह किया और अपने विद्रोहों के द्वारा स्वतंत्रता की सीमा का विस्तार भी किया है।"
हर जाति और वर्ग को राजनीति में सक्रिय रहना चाहिए क्योंकि राजनीति और सत्ता ही जातियों और वर्ग की बदहाल स्थिति को खुशहाल स्थिति में बदलती है। भारत देश किसानों, जातियों और गाँवों का देश है। गाँव ही किसानों की जन्मभूमि और कर्मभूमि हैं। किसानों में पिछड़ा वर्ग ही वास्तविक किसान वर्ग है। हम पिछड़ा वर्ग को किसान वर्ग कहना ज्यादा उचित समझते हैं। हम भारतीय संविधान में एक और संशोधन कराना चाहते हैं कि पिछड़ा वर्ग या अन्य पिछड़ा वर्ग को किसान वर्ग से प्रतिस्थापित किया जाए। किसान वर्ग अनेक जातियों का समुंदर है। कुशवाहा, यादव, पटेल, मौर्य, सैनी, पाल, रायकवार समेत पिछड़ा वर्ग में सूचीबद्ध सैकड़ों जातियाँ ही किसान जातियाँ हैं। किसान जातियाँ राजनीति में जितनी अधिक सक्रिय रहेंगी, उतना तेजी से उनका विकास होगा। किसान जातियों के सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, राजनैतिक और आर्थिक विकास के बिना विकसित भारत की अवधारणा साकार नहीं होगी।
महान सामाजिक क्रांतिकारी बाबू जगदेव प्रसाद कुशवाहा जी ने किसान - दलित - आदिवासी समाज की दशा और दिशा बदलने के लिए ठीक ही कहा था - "सौ में नब्बे शोषित हैं, नब्बे भाग हमारा है। धन, धरती और राजपाट में, नब्बे भाग हमारा है।।"
देश में जाति जनगणना और यूजीसी समता कानून के लागू होने से किसान जातियों की दशा में युगान्तकारी परिवर्तन आएगा। जब तक किसान जातियों का चहुँमुखी विकास नहीं होगा तब तक भारत में जाति जरूरी है। जाति हमारी अस्मिता है। जाति से ही संस्कृति और भाषा विकसित हुई है। यदि जाति का विनाश किया तो हमारी अस्मिता, संस्कृति और भाषा का भी विनाश हो जाएगा इसलिए जाति जिन्दा रहनी चाहिए। लेकिन देश से जातिवाद और जातिगत भेदभाव का विनाश होना चाहिए। जातिवाद और जातिगत भेदभाव के विनाश से ही किसान जातियों के साथ सामाजिक न्याय हो सकेगा।
डॉ. लोहिया जी ने किसानों के जीवन संघर्ष का मूल्यांकन करते हुए कहा था - "गत वर्ष से भारत का किसान आंदोलित हो उठा है। आए दिनों अनेक सम्मेलन हुए हैं। उन्होंने बड़े-बड़े प्रदर्शन किए हैं और कभी-कभी लड़े भी हैं और मुसीबतें बर्दाश्त की हैं। किसानों और खेत मजदूरों ने भी बेदखली, फसल की खराबी, अनुचित और कम मजदूरी तथा भूमि सुधार की मंद गति के विरुद्ध संघर्ष किया है। जनता में नवजीवन जगाने के कारण उन्हें डंडे खाने पड़े हैं। जेल की यातनाएँ भुगतनी पड़ी हैं और कुछ को तो शहीद भी होना पड़ा है।"
डॉ. लोहिया जी किसानों का चहुँमुखी विकास चाहते थे इसलिए उन्होंने हिन्द किसान पंचायत के प्रथम राष्ट्रीय अधिवेशन के अध्यक्षीय भाषण में किसान की आवाज बताते हुए किसान आंदोलन के छः लक्ष्य निर्धारित किए - (1) जमीन जोतने वाले किसान को सरकारी आदेश द्वारा तुरंत जमीन दी जाए। (2) परती भूमि के लिए भूमि सेना बनाई जाए। (3) छोटी मशीनों द्वारा औद्योगिकीकरण किया जाए। (4) भूमि का पुनः बटंवारा हो और हर परिवार को 20 बीघा जमीन और एक गाय मिले। (5) कृषि उत्पादों (फसल, सब्जी इत्यादि) और औद्योगिक उत्पादों (कपड़ा, यंत्र इत्यादि) की कीमतों में समानता होनी चाहिए। (6) चौखम्बा राज स्थापित होना चाहिए।
चौखम्बा राज लागू करने हेतु ग्राम सभा को स्वशासन का अधिकार देने की वकालत करते हुए डॉ. लोहिया जी ने कहा था - "देश में विशेष स्थितियों, अशिक्षा, अंधविश्वास, डर और जातीयता के कारण बहुतों के चौखम्बा राज की विचारधारा अति कल्पना जान पड़ती है। गाँवों के प्रतिनिधि स्वार्थी, अज्ञानी हो सकते हैं। फिर भी भय और भष्ट्रता वालों तथा कुछ थोड़े से लोगों के हाथों में केंद्रित सत्ता वाले शासन से मुक्ति पाने के लिए केवल एक ही उपाय है कि गाँवों को स्वशासन का अधिकार दे दिया जाए।"
शिक्षा के बिना किसी भी जाति का चहुँमुखी विकास संभव नहीं है इसलिए डॉ. लोहिया जी ने किसान जातियों की शिक्षा पर विचार करते हुए कहा था - "हर हाल में सारे देश में एक नया जाल बिछ जाना चाहिए। कारीगरों के लिए स्कूलों का और जनता के विश्वविद्यालयों का, जहाँ किसान, मजदूर और गरीब मध्यम वर्ग हुनर की शिक्षा पा सके और इच्छा रहने पर विश्वविद्यालय की भी।"
वर्तमान भारत में कृषि विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के संचालन का श्रेय किसानवादी लोहिया को ही जाता है। डॉ. लोहिया जी ने हिन्द किसान पंचायत के अधिवेशन में अध्यक्षीय भाषण के अंत में किसान को समाजवाद का महान निर्माता बताते हुए कहा था - "किसान नए समाज का निर्माता है, यह सिद्धांत वास्तविकता पर आधारित है। जहाँ तक खेती की उपज के मूल्य का प्रश्न है, औद्योगिक उत्पादन के मूल्य के साथ उसकी समानता लाने पर किसान तथा शेष समाज के बीच का शोषण समाप्त हो जाएगा। धरती और प्रकृति के निकट रहने वाला किसान स्वभावतः शांति और विश्व सरकार के आदर्श का स्वागत करेगा। बड़े जमींदारों को छोड़कर भारत के विशाल खेतिहर समुदाय का प्रत्येक व्यक्ति समाजवाद का महान निर्माता है।"
किसान की खुशहाली से ही देश की समृद्धि होती है। इसलिए देश की समृद्धि के लिए देशवासियों और सरकार को किसानवादी लोहिया के बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लेना चाहिए।




