महाशिवरात्रि: पौराणिक गाथाएं और आध्यात्मिक रहस्य

भारतीय संस्कृति में पुराणों का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। महाशिवरात्रि के संदर्भ में विभिन्न पुराणों में अलग-अलग कथाएं मिलती हैं, जो अंततः एक ही सत्य की ओर इशारा करती हैं-शिव ही आदि और अनंत हैं।
1. शिव पुराण: ज्योतिर्लिंग का प्राकट्यशिव पुराण के 'कोटिरुद्र संहिता' के अनुसार, महाशिवरात्रि वह दिन है जब भगवान शिव पहली बार अग्नि स्तंभ (ज्योतिर्लिंग) के रूप में प्रकट हुए थे।
कथा: ब्रह्मा जी और विष्णु जी के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद हुआ। तब एक विशाल अग्नि स्तंभ प्रकट हुआ जिसका न आदि था न अंत।
निष्कर्ष: भगवान शिव ने इसी दिन सिद्ध किया कि वे निराकार और अनंत हैं। महाशिवरात्रि इसी दिव्य प्रकाश के उत्सव की रात है
।2. लिंग पुराण: सृष्टि का संरक्षण (विशपान)समुद्र मंथन की कथा का वर्णन कई पुराणों में है। जब मंथन से 'हलाहल' विष निकला, तो पूरी सृष्टि विनाश के कगार पर थी।
संदर्भ: देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव ने उस विष को पी लिया और अपने कंठ में रोक लिया, जिससे उनका गला नीला पड़ गया और वे 'नीलकंठ' कहलाए।
महत्व: भक्तों का मानना है कि शिव ने इस दिन विष पीकर संसार की रक्षा की थी, इसलिए कृतज्ञता प्रकट करने के लिए यह पर्व मनाया जाता है।
3. स्कंद पुराण: शिव-शक्ति का विवाहस्कंद पुराण के अनुसार, महाशिवरात्रि वह परम पावन तिथि है जब भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था।यह विवाह वैराग्य और गृहस्थ जीवन के संतुलन का प्रतीक है।आध्यात्मिक रूप से, यह 'शिव' (चेतना) और 'शक्ति' (ऊर्जा) के मिलन का उत्सव है, जिसके बिना सृष्टि का संचालन असंभव है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार पूजन का फलपुराणों में बताया गया है कि जो व्यक्ति महाशिवरात्रि पर चार प्रहर की पूजा करता है, उसे विशेष लाभ मिलते हैं:
प्रहर अर्पण (मुख्य वस्तु)फल
प्रथम प्रहर दूध आरोग्य और शांति
द्वितीय प्रहर दही सौभाग्य और समृद्धि
तृतीय प्रहर घी ज्ञान और विद्या
चतुर्थ प्रहर शहद मोक्ष और मुक्ति
राणों के अनुसार, महाशिवरात्रि आत्म-निरीक्षण की रात है। यह हमें सिखाती है कि हमारे भीतर का 'शिव' तत्व ही हमें अंधकार (अज्ञान) से प्रकाश (ज्ञान) की ओर ले जा सकता है। चाहे वह पार्वती जी का कठोर तप हो या शिव का विषपान, हर कथा हमें धैर्य, त्याग और प्रेम का मार्ग दिखाती है।




