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कोई भटका हुआ लड़का है, गोपाल!

कोई भटका हुआ लड़का है, गोपाल!

कोई भटका हुआ लड़का है, गोपाल! कहीं भीड़ की ओर नली कर के कट्टा दाग दिया है। लालू जी के बिहार में बचपन बीता है, सो कट्टे की औकात जानता हूँ। बचपन मे खूब कहानियां सुनी हैं, बीस फीट दूर से चले तो आदमी क्या बकरी नहीं मरेगी। देख रहा हूँ कुछ लोग भड़के हुए हैं। ये वही लोग हैं जिन्होंने दो सौ लोगों के हत्यारे के लिए आधी रात को कोर्ट खुलवाया था।

जिस देश में रोज ही सैकड़ों हत्याएं होती हों, वहाँ के लिए यह घटना बहुत बड़ी नहीं है, फिर भी जाने क्यों काँप गया हूँ। अब इधर के लड़के भी भटकने लगे? हम कभी भटकने के लिए नहीं जाने गए। हम जाने गए राष्ट्र पर बलि चढ़ने के लिए, हम जाने गए सेवा के लिए, सद्भाव के लिए, स्नेह के लिए, बसुधैव कुटुम्बकम के मंत्र के लिए... हम जाने गए माता पद्मावती के लिए, बाबा प्रताप के लिए, गौतम के लिए, महाबीर के लिए... हमें गढ़ा था शबरी के राम ने, हमें रचा है सुदामा के कृष्ण ने... फिर हम कैसे भटक सकते हैं?

पर रुकिए! तनिक खोजिए, कौन हैं वे लोग जिन्होंने भटकने को फैशन बना दिया? वे कौन लोग हैं जो कल तक हर आतंकवादी के साथ यह कह कर खड़े हो जाते थे कि भटका हुआ नौजवान है।

चार दिन नहीं हुए जब उसी भीड़ को सम्बोधित करते हुए किसी ने देश तोड़ने की खुलेआम प्लानिंग की थी। क्या हुआ, दो दिन बाद ही रबीश कुमार जैसे लोग उसके समर्थन में खड़े हो गए और नेशनल चैनल पर खुलेआम झूठ बोलने लगे कि अरेस्ट नहीं हुआ है सरेंडर किया है। उसे देशभक्त बताया जाने लगा...

इस देश का एक बड़ा शायर राहत इंदौरी सरेआम चुनौती देते हुए कहता है कि "सच में आतंकवादी हो जाएं तो क्या होगा?" कोई उसका विरोध नहीं करता,बल्कि उसे बुद्धिजीवी कहा जाता है। कैसे न बिगड़ें लड़के?

चालीस वर्षों से पार्टी का झोला ढ़ो रहे लोग टिकट के लिए तरसते रह जाते हैं और कन्हैया जैसे चार दिन के लौंडे केवल भारत विरोधी नारे लगा कर देश भर में चर्चित हो जाते हैं, तो नए लड़के कैसे नहीं भटकेंगे?

ठीक से देखिये लड़के को, उसके चेहरे पर डर साफ दिख रहा है। ये वे लड़के हैं जो यह सोच कर डरे हुए हैं कि जब कुछ औरतें मिल कर राजधानी की एक मुख्य सड़क को महीनों तक बन्द कर सकती हैं तो पुरुष मिल कर क्या करेंगे। यकीन कीजिये, उस लड़के की हरकत भले नाजायज हो, उसका डर जायज है। कौन हैं वे लोग जो उसके मन मे डर भर रहे हैं?

याद रखिये, जब-जब आप एक हिस्से के उपद्रवियों का समर्थन करेंगे तो दूसरे हिस्से में भी वैसे लोग खड़े होंगे। इसे कोई रोक नहीं सकेगा... उस कट्टे का स्वर प्रतिरोध का ही एक विकृत स्वर है। इसके लिए तुम ही जिम्मेवार हो गद्दारों! मैं उस स्वर की निंदा करता हूँ...

मेरे देश के बुद्धिभोजियों! मेरे देश पर दया करो... आतंक को फैशन न बनाओ... हम शांति से जीने वाले लोग हैं, हमें शांति से जीने दो...

यह हमारा गोपाल नहीं है, हमारे गोपाल की तो दुनिया दीवानी है।

सर्वेश तिवारी श्रीमुख

गोपालगंज, बिहार।

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