2000 रुपये तक ही गुप्त चंदे की सिफारिश पर सियासी दलों को सांप सूंघा

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2000 रुपये तक ही गुप्त चंदे की सिफारिश पर सियासी दलों को सांप सूंघा

काले धन पर कार्रवाई को लेकर हर राजनीतिक दल बढ़-चढ़ कर बयान देता है. लेकिन चुनाव आयोग ने राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले बेनामी नकद चंदे पर नकेल कसने के लिए सिफारिशें क्या कीं, मानो सभी पार्टियों को जैसे सांप सूंघ गया. अधिकतर पार्टियों ने चुनाव आयोग की सिफारिशों पर टीका टिप्पणी करने से परहेज में ही भलाई समझी. उनका कहना है कि सरकार की जिम्मेदारी है कि तमाम पार्टियों को विश्वास में लेकर इस मुद्दे पर संसद में चर्चा कराए, उसके बाद संविधान में संशोधन का फैसला हो.

चुनाव आयोग ने राजनीतिक पार्टियों को 2000 रुपए से कम ही गुप्तदान की अनुमति दिए जाने की सिफारिश की है. चुनाव आयोग ने चुनाव में काले धन के इस्तेमाल पर रोक लगाने की कोशिश के तहत सरकार से कानूनों में संशोधन की जरूरत जताई है. चुनाव आयोग की कोशिश राजनीतिक दलों को 2 हजार रुपए या उसके ऊपर दिए जाने वाले गुप्त चंदों पर रोक लगाने की है.

अभी तक राजनीतिक दलों के गुप्त चंदा लेने पर कोई संवैधानिक या वैधानिक प्रतिबंध नहीं है. लेकिन जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 29सी के तहत चंदों की घोषणा की जरूरत के चलते गुप्त चंदों पर एक 'अप्रत्यक्ष आंशिक प्रतिबंध' है. लेकिन ये बात सिर्फ 20,000 रुपए से ऊपर के गुप्त चंदों पर ही लागू होती है.

यानी अब तक 20 हजार रुपये से नीचे गुप्तदान करने वालों का नाम पता और अन्य जानकारियां लेने से राजनीतिक दलों को छूट थी. लेकिन अब आयोग की सिफारिश है कि सरकार को इस मामले में और ज्यादा पारदर्शिता लाने के लिए सीमा को 20 हजार से घटाकर दो हजार कर देना चाहिए.

आयोग का ये भी कहना है कि चुनाव ना लड़ने वाली पार्टियों का रजिस्ट्रेशन रद्द करने का अधिकार भी आयोग को देना चाहिए. फिलहाल, इस बडी सिफारिश पर खासकर विपक्षी दल कुछ भी सीधी प्रतिक्रिया देने से बच रहे हैं. बात आयोग की सिफारिश की है तो इस पर कुछ कहने की जगह सरकार को ही नसीहत देने में उन्होंने बेहतरी समझी. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा ने इसे सरकार का विशेषाधिकार बताते हुए कहा कि चुनाव आयोग की सिफारिशों पर कैसे अमल करना है, ये सरकार तय करे.

वोरा ने साथ ही कहा कि इस पूरी प्रक्रिया में सभी पार्टियों से संसद में विचार विमर्श होना जरूरी है. वोरा ने माना कि कुछ राजनीतिक दल चंदे के हिसाब में गड़बड़ करते हैं. वोरा के मुताबिक कांग्रेस हमेशा अपनी आमदनी और खर्च का ब्यौरा आयकर विभाग को देती है. दूसरी ओर, जेडीयू के नेता पवन वर्मा ने भी चुनाव आयोग की सिफारिशों का स्वागत किया है. वर्मा ने भी इन सिफारिशों पर अमल के लिए कदम उठाने का जिम्मा सरकार का बताया है.

हालांकि अब तक बहुत कम अवसर ऐसे आए हैं जब चुनाव आयोग और फिर उस पर विधि आयोग की सिफारिशों पर संसद में गंभीरता से चर्चा होकर उन सिफारिशों को लागू करने के लिए कानूनी प्रावधानों में संशोधन किया गया हो. अधिकतर सिफारिशें तो रिपोर्टों की भारी भरकम फाइलों से भी बाहर नहीं आ पातीं.

कांग्रेस कोषाध्यक्ष वोरा के मुताबिक चुनाव आयोग की सिफारिशों को केंद्र की ओर से अमूमन गंभीरता से ही लिया जाता है. इस मामले में प्रक्रिया के बारे में वोरा ने बताया कि सिफारिशों को संसद के पटल पर रखा जाता है. चुनाव आयोग की सिफारिशें कानून मंत्रालय को जाती हैं. कानून मंत्रालय इसे विधि आयोग को भेजता है फिर विधि आयोग इनकी कानूनी व्यावहारिकता की पड़ताल कर अपनी टिप्पणियों के साथ इसे सरकार को भेजता है.

ये तो हुई प्रक्रिया लेकिन सच्चाई ये है कि इक्का दुक्का मौके ही आये हैं जब राजनीतिक पार्टियों ने अपनी सुविधा के मुताबिक जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन किये हैं वो भी अपने राजनीतिक नफा नुकसान देखते हुए. हालांकि आयोग पहले भी कई बार चुनाव में काले धन का इस्तेमाल रोकने, बाहुबल पर रोक लगाने, आपराधिक रिकॉर्ड वाले उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से अयोग्य करने के अलावा आचार संहिता का उल्लंघन करने पर सख्त प्रावधान करने की सिफारिशें कर चुका है. ये अलग बात है कि अधिकतर सिफारिशें सिर्फ रिपोर्ट का हिस्सा बन कर पड़ी हैं, यानि अमल नहीं हुआ.

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी का कहना है कि ये मुहिम उस समय ही शुरू हुई थी जब वो चुनाव आयुक्त नियुक्त हुए थे. कुरैशी के मुताबिक अपने कार्यकाल में उन्होंने न केवल इसे आगे बढ़ाया बल्कि मजबूत भी किया. कुरैशी ने कहा कि वो अब इसे साकार होते हुए भी देखना चाहते हैं. जितनी जल्दी इस कवायद का नतीजा आएगा, उतना ही ये देश में लोकतंत्र के हित में ही होगा.

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