सरसो के फूलों पर बैठ कर आता है वसन्त!

सरसो के फूलों पर बैठ कर आता है वसन्त!

सरसो के फूल देख कर आपको हाथ में मेंहदी का रङ्ग और देह पर पीली चुनरी ओढ़े किसी नव-विवाहिता स्त्री का स्मरण नहीं हो आता? सरसो का पौधा जब अपने मुँह में फूल उठाता है न, तब पूरी प्रकृति महकने लगती है। ठीक वैसे ही, जैसे घर मे आई नई कनिया का पीला सिंदूर पूरे घर मे महक उठता है... हवा से सरसराती पत्तियां, जैसे दुल्हन की पायल... बलिया वाले अतुल कुमार राय शायद इसी को जीवन सङ्गीत कहते हैं।

बलिया के ही थे डॉ केदार नाथ सिंह, जिन्होंने लिखा, "तुम आईं, जैसे छिमियों में धीरे धीरे आता है रस.." पता नहीं केदार चाचा ने किसके लिए लिखा था यह सब, पर मैं यदि प्रकृत को प्रेमिका मानूँ तो कहना ही होगा कि वह सोलह शृंगार के साथ उसी तरह आती है, जैसे सरसो की छिमियों में धीरे धीरे रस आता है। है न?

इन्हीं सरसो के फूलों पर बैठ कर आता है वसन्त! जहाँ खेत न हों, और खेतों में सरसो न हो, वहाँ बसन्त का आना-जाना वैसा ही है जैसा पाठकों के बीच में अकादमिक साहित्यकारों की किताब का आना। पता ही नहीं चलता कि कब आयी, कब गयी... आपको राजेन्द्र यादव की किसी पुस्तक का नाम याद है? अशोक वाजपेयी की किताब का नाम? अच्छा, मैत्रेयी पुष्पा जी की किताब? नहीं न?

चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की विश्वप्रसिद्ध कहानी "उसने कहा था" में घर से हजारों मील दूर युद्ध में मरते लहणा सिंह को अंतिम क्षणों में जीवन की सारी घटनाएं याद आती हैं। प्रेम, त्याग, समर्पण, माँ, बाबूजी, सब... बहुत पहले पढ़ी थी वह कहानी, सो भूल गया हूँ कि लहणा सिंह को अपने सरसो के खेत याद आये थे कि नहीं! याद आये ही होंगे, एक ग्रामीण व्यक्ति जिसने खेत देखा हो, वह जानता है कि सरसो के फूल प्रेमिका के मुख से भी अधिक सुंदर लगते हैं। लहणा सिंह की जगह हम होते तो सरसो सौ बार याद आता..

पिछले पचास वर्षों में फूलों में गुलाब ने बड़ी प्रतिष्ठा कमाई है। बाजार ने तो उसे फूलों का राजा घोषित कर दिया है। प्रेम का प्रतीक बन गया है गुलाब। मैं अपनी बताऊं तो मुझे गुलाब देख कर प्रेम याद नहीं आता, मेरा प्रेम सरसो देख कर फफ़ाता है। गुलाब का सौंदर्य किसी मिनी स्कर्ट धारिणी की भाँति होता है, देखते ही आँखों को चौंधिया देने वाला लिपिस्टिकीय सौंदर्य... और सरसो? सोच कर देखिये, आँखे ठंढी हो जाएंगी... मैं किसी की निंदा नहीं कर रहा हूँ। हाँ देहाती आदमी हूँ, मेरी नायिका के अधरों पर लिपिस्टिक से अधिक गालियाँ होती हैं। वह लिपिस्टिक इसलिए नहीं लगाती क्योंकि "भतारकाटी" कहने के समय होठ टकरा जाते हैं और लिपिस्टिक खराब होने लगती है।

वस्तुतः गुलाब पश्चिम में प्रेम का प्रतीक रहा है, और सरसो भारत मे। पश्चिम में प्रेम का रङ्ग गुलाबी है, भारत मे पीत। विवाह के महीने भर पूर्व से ही यहाँ वर-वधु को पीत-वस्त्र पहनाया जाता है, दोनों के हाथ पीले हो जाते हैं। एक भाई जब खुश हो कर अपने भाई-पटीदार को वस्त्र देता है तो धोती को पीले रङ्ग में रङ्ग कर देता है। भाई से मिली पियरी धोती पहनने का आनंद किसी बुजुर्ग से पूछियेगा, तब पता चलेगा प्रेम का रङ्ग। इस सृष्टि के एक मात्र पूर्ण पुरुष "श्रीकृष्ण" पीताम्बर क्यों ओढ़ते थे, अब समझे? तो लगे हाथ यह भी समझ लीजिए कि इस सृष्टि में सरसो के फूलों से अधिक पीला और कुछ नहीं होता।

जानते हैं, हमारे पूर्वांचल में विवाह के समय लड़का और लड़की दोनों के यहाँ सरसो अईंछने की रीति है, ताकि नजर न लगे। शायद देश के अन्य भाग में भी हो! मैंने सोचा था, सरसो ही क्यों? अब कारण समझ मे आता है, सरसो को देख कर किसी की नजर खराब हो ही नहीं सकती। कुछ बस्तुओं को देख कर किसी की नजर खराब नहीं होती। जैसे गाय की नवजात बछिया, खेतों में गेहूँ काटती किसी किसान की बेटी, सरसो के फूल... इनको नजर नहीं लगती।

प्रसव के बाद स्त्री की जो पहली मुस्कान होती है न, प्रकृति के लिए सरसो के फूल उसी मुस्कान की तरह हैं। इनको भला किसी की नजर क्या लगेगी...

आपको भी किसी की नजर न लगे, और भारत को भी किसी की नजर न लगे... जय हो।

सर्वेश तिवारी श्रीमुख

गोपालगंज, बिहार।

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