बड़के नेता जी ने छोटके नेता जी को जूते से मारा...

बड़के नेता जी ने छोटके नेता जी को जूते से मारा...

जनता क्रोध में है। क्रोध करने वाली जनता वही जनता है जिसे नेता जी पिछले बहत्तर वर्षों से जूता मार रहे हैं। जनता अपने ऊपर गिरते जूतों का हिसाब नहीं रखती, वह दूसरों द्वारा तीसरों पर बरसाए जाने वाले जूतों की गति नापती है। लोकतंत्र में जनता कि यही बौद्धिक सीमा तय की गई है, या कहें तो यही उसकी सामर्थ्य है।

जनता यदि देखना चाहती तो देखती कि लोकतंत्र के चारो खंभे उसे लगातार जूता मारते रहे हैं। विधायिका को छोड़िये कार्यपालिका को देखिये, किसी छोटे से सरकारी दफ्तर का चपरासी भी कैसे देश की मालिक प्रजा को डांट कर बात करता है, क्या यह आपको जूते मारने की तरह नहीं लगता?

कार्यपालिका को भी छोड़िये न्यायपालिका को देखिये, देश के सबसे बड़े मुद्दे को पिछले सत्तर वर्षों से लगातार टरकाते जज साहब आपको जूता मारते नहीं दिखते? राम मंदिर के केस में जब सात सेकेंड की लंबी सुनवाई के बाद मुस्कुराते हुए जज साहब अगली तारीख घोषित कर देते हैं, तब आपको नहीं लगता कि वे देश की सवा सौ करोड़ जनता के मुँह पर जूता मार रहे हैं।

जज साहब को भी छोड़िये, स्वयं को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ घोषित कर चुकी मीडिया आपको जूता मारती हुई नहीं लगती है? नहीं लगती तो फिर आप पक्के लोकतांत्रिक मनुष्य हैं।

मुझे इस जूता काण्ड पर कोई आश्चर्य नहीं है, क्योंकि जो हुआ वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अनुरूप ही हुआ है। लोकतंत्र की प्राचीन परम्परा है कि हर बड़ा व्यक्ति अपने से छोटे को जूता मारता है। लोकतंत्र में अपने से छोटे को जूता मारना ही किसी भी व्यक्ति के बड़े होने का प्रमाण होता है। अपने से छोटे को जूता मारना हर बड़े व्यक्ति का लोकतांत्रिक अधिकार है, और अपने से बड़े के जूते को उपहार समझ कर ग्रहण करना हर छोटे का मौलिक कर्तव्य... सांसद महोदय कुर्सी के आकार के अनुसार विधायक जी से बड़े हैं, सो उनका जूता मारना लोकतांत्रिक ही है। बुरा तब होता जब माननीय विधायक महोदय सांसद महोदय को जूता मारते। यह अनैतिक भी होता और अलोकतांत्रिक भी...

लोकतंत्र में छोटे द्वारा बड़े को जूता मारने का अलग विधान है। यदि आपको अपने से बड़े को जूता मारना हो तो आप चाँदी के जूतों का प्रयोग कर सकते हैं। चाँदी का जूता समझते हैं न? क्यों नहीं समझेंगे, आखिर आप भी तो लोकतंत्र में ही जीते हैं न... साल में जाने कितनी बार आपको सरकारी दफ्तर के बाबुओं को चाँदी का जूता मारना पड़ता होगा। बस वही...

लोग दुखी हैं कि पहली बार किसी नेता ने नेता को जूता मारा है। मैं खुश हूँ कि पहली बार किसी नेता ने नेता को जूता मारा है। मेरी खुशी का अर्थ समझ रहे हैं न? एक ही बात पर कुछ लोग दुखी हैं, मैं खुश हूँ... जाने क्यों!

कुछ लोग इसे राजनीति से जोड़ कर देख रहे हैं, और कुछ लोग इसे राजनीति से जोड़े जाने के विरुद्ध हैं। मैं कह रहा हूँ इसे राजनीति से जोड़ने की आवश्यकता ही नहीं, बल्कि यही राजनीति है। लोकतंत्र में जूता मारने को ही राजनीति कहते हैं।

वैसे एक बात कहूँ, तनिक ध्यान से देखिएगा उस वीडियो को, मुझे लगता है जूता विधायक जी पर नहीं गिर रहा। किस पर गिर रहा है यह भी बताने की आवश्यकता है भला...

सर्वेश तिवारी श्रीमुख

पटना, बिहार।

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