कहानी .. सिक्योरिटी गार्ड का चयन और अदम्य धैर्य और अभ्यास का अनूठा उदहारण

कहानी .. सिक्योरिटी गार्ड का चयन और अदम्य धैर्य और अभ्यास का अनूठा उदहारण

एक बार एक कम्पनी में सिक्योरिटी गार्ड की भर्ती में असफलता उपरांत एक लम्बे, तगड़े व्यक्ति ने चयन प्रक्रिया पर आपत्ति जताई. उसने चयनकर्ता से यह प्रश्न किया कि किस आधार पर आपने अमुक व्यक्ति का चयन किया जबकि मेरे पास सिक्योरिटी गार्ड भर्ती की प्रत्येक अहर्ता एवं योग्यता, अमुक से अधिक है। मेरी लम्बाई इनसे दो इंच ज्यादा ठहरेगी। मेरी शारीरिक संरचना एवं सौष्ठव प्रत्यक्ष रूप से इनसे प्रभावी हैं।

सर! सिर्फ मैं आपसे यह जानने का इच्छुक हूँ कि आपने किस आधार पर मेरे स्थान पर अमुक व्यक्ति का चयन किया।

चयनकर्ता ने आरोपकर्ता की बात बड़े गौर व धैर्य से सुनी फिर अपना ऐनक निकाल कर मेज पर रखा और बड़े शान्त भाव से बोला- "भैया सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी ऐसी नहीं है कि जिसमें रोज गोलियाँ बरसानी पड़े. घंटों परेड करनी पड़े। यह बड़े धैर्य की नौकरी है.. दस-दस घंटे एक ही स्थान पर चुपचाप बैठना होता है। नौकरी में सालों-साल ऐसे ही गुजर जाता है कुर्सी-स्टूल पर बैठे.. यह सही है कि आपकी कदकाठी और फुर्ती अगले से बेहतर है लेकिन आपके भीतर इनके जितना धैर्य नहीं.

" ऐसा आप किस आधार पर कह सकते हैं श्रीमान्" आरोपकर्ता के प्रश्न में क्रोध एवं विस्मय दोनों भाव मिश्रित थे।

"अगले के पास अनगिनत अनुभव प्रमाणपत्र हैं....घंटों लगातार एक ही स्थान पर बैठने का एक बड़ा अनुभव बटोरा है उन्होंने" चयनकर्ता ने अपनी बात मजबूती से रखी।

"किस प्रकार के अनुभव हैं उनके, तनिक विस्तार से बतावें" आरोपकर्ता के भीतर अब कौतूहल मचने लगी थी।

" भैया! अगला आदमी पिछले पांच वर्षों में मण्डल स्तर के सैकड़ों साहित्यिक कार्यक्रमों में दर्शकदीर्घा का अनिवार्य सदस्य रहा है। जिले-जवार के जितने भी आयोजक हैं इन्हें अपने कार्यक्रम में आमंत्रित करते हैं..महाशय प्रत्येक कार्यक्रम में अनिवार्य रूप से उपस्थित तो होते ही है मजे की यह कि पूरे कार्यक्रम के दौरान मजाल है कि वो कुर्सी छोड़कर उठते हों। आपकी नजर में भले यह सामान्य हो लेकिन यह अदम्य धैर्य और अभ्यास का अनूठा उदहारण है। कम्पनी को ऐसे ही धैर्यशील व्यक्ति की आवश्यकता है।

चयनकर्ता की बात सुनकर आरोपकर्ता निरुत्तर हो गये बिचारे चुपचाप अपनी आपत्ति लेकर केबिन से बाहर हो गये।

यदि मुझे व्यक्तिगत तौर पर इन दो कार्यों में से एक को चुनने का विकल्प हो-

पहला-शहर/गांव में घूम रहे साड़ो को पकड़ना..

दूसरा- किसी साहित्यिक कार्यक्रम के लिए श्रोता जुटाना (आप पकड़ना भी समझ सकते हैं)

ईमानदारी से कहूँ तो मेरे लिए पहला विकल्प चुनना आसान है भले उसमें जोखिम क्यों न हो। मेरा मानना है कि थोड़ी जोखिम या मशक्कत के बाद यदि मैंने साड़ पूरी तरह पकड़ के कैद कर लिया तब वो गिनती में आ जायेगा लेकिन श्रोता पकड़ में आने पर भी आप उसे गिन सकें यह साहस आयोजकों के भीतर तब तक नहीं आता जब तक कार्यक्रम सम्पन्न नहीं हो जाता।

आयोजक मंडल को जितनी मशक्कत किसी कवि अथवा साहित्यकार को बुलाने में करनी पड़ती है उससे कहीं ज्यादा श्रोताओं को बुलाने और घेरने में। मंच पर आसीन होने वालों की संख्या, कुर्सी के मुकाबले कभी कम न होती यहाँ तक की एक दो कुर्सियां बढ़ानी भी पड़ती हैं लेकिन दर्शक दीर्घा की कुर्सियां भरना वैसे ही है जैसे 'बोरे में तेल भरना.'

शतरंज के खेल में प्यादे रखने के बाद जितने प्रतिशत खाने भरे रहते हैं यदि उतनी कुर्सियां भी साहित्यिक कार्यक्रम में भर जायें तब भी आयोजक मंडल के लिए कुंभ का स्नान जैसा है लेकिन ऐसे कार्यक्रमों में दर्शक एवं कुर्सियों का अनुपात अक्सर लूडो की गोटी और खानों जैसा ही रहता है।

साहित्य के 'कार्यक्रम एवं उसके श्रोता' दुनिया के अन्य कार्यक्रमों की तुलना में थोड़े जुदा होते हैं। यह सम्बन्ध बिल्कुल ऐसा है जैसे डाक्टर, मरीज और इन्जेक्शन का. साहित्यकार डाक्टर की भांति अपने कविता, कहानियों या रचनाओं का भरा हुआ इन्जेक्शन लेकर मंच पर चढ़ता है और पूरा इन्जेक्शन श्रोताओं के मन-मस्तिष्क में खाली कर देता है। टीकाकरण के दौरान जितने सशंकित बच्चे सूईंयों से होते हैं उतने ही साहित्य का श्रोता भी...वैसे मरीज/श्रोता प्रयास करता है कि इन्जेक्शन की पूरी डोज लेकर उठे लेकिन सभी इतना धैर्य और साहस नहीं जुटा पाते।

साहित्यिक कार्यक्रमों में श्रोताओं को जितनी पेशाब महसूस होती है उतनी पेशाब शायद ही किसी कार्यक्रम में महसूस होती हो। हांलाकि एयरकंडीशनर थियेटर में ठंड के कारण पेशाब लगने की संभावना गर्म शामियाने में चल रहे साहित्यिक गोष्ठियों से अधिक होती है लेकिन न जाने क्यूं थियेटर में मध्यावकाश तक कोई कुर्सी नहीं छोड़ता किन्तु ऐसे कार्यक्रमों में पेशाब का दबाव लगातार बना रहता है।

यदि आप श्रोता के हैसियत से किसी साहित्यिक कार्यक्रम जा रहें हो तो पूरी संभावना है कि आप अकेले ही जायेंगे। कार्यक्रम में जाते वक्त यदि किसी ने आपसे पूछा कि " आप कहां जा रहे हैं" आपने भी निश्चल एवं बेबाक उत्तर दे दिया कि " साहित्यिक कार्यक्रम में" उस वक्त आप पूछने वाले व्यक्ति का चेहरा गौर से देंखें! वह अपार संवेदना के साथ आपको देखेंगा.. जैसे आप साहित्यिक कार्यक्रम में श्रोता न होकर किसी नामी मुजरिम के विपक्ष में खड़े होकर कोर्ट में गवाही देने जा रहे हों।

आपका शुभचिंतक किसी अति विशेष कार्य हेतु आपको फोन करे और प्रतिउत्तर में आप बतायें कि आप किसी साहित्यिक गोष्ठी में हैं तो यह पूरी संभावना है कि वह आपके आने की प्रतीक्षा करेगा। यकीन जानिए आप उसे कार्यक्रम स्थल पर बुला नहीं पायेंगे। यदि कार्य बहुत आकास्मिक एवं महत्वपूर्ण है तो वह आपको कार्यक्रम स्थल के बाहर बुलाने का पूरा प्रयास करेगा। वह इस कदर से अन्तर के वातावरण से भयभीत रहेगा मानो अन्दर पुरूष नसबंदी चल रही हो वो भी अनिवार्य रूप से।

ऐसा नहीं कि केवल श्रोता ही दोषी होते हैं दोष मंच और मंचासीन लोगों का भी कम नहीं होता। मंच के लोग गिनती के लोगों को अपने आंख में कैद कर लेते हैं। आपके उठते ही आपको ऐसे घूरेंगे कि मानों आप लाइब्रेरी से किताब चुराकर जा रहें हों. आप मजबूर होकर अगले को एक अंगुली दिखाकर कुर्सी छोड़ते हैं कि सभी लोग जान लें कि मैं लघुशंका में जा रहा हूँ। इधर जब तक कुर्सी पर आपकी वापसी नहीं हो जाती मंच की निगाह आप पर बनी रहती है।

मंचासीन व्यक्तियों का माइक के अगाध प्रेम से भला कौन नहीं परिचित! समझिए कि गाय के थन से बछड़े को खींचकर हटाना आसान है लेकिन किसी भी कवि/लेखक के हाथ से माइक छुड़ाना एक दुरूह कार्य। संचालक द्वारा वक्त की कमीं और माइक प्रेमपूर्वक मांगने(छीनने) का दृश्य साहित्यिक कार्यक्रमों में अक्सर देखा-सुना जा सकता है। संचालक मंच का एक ऐसा पात्र है जो संचालन के दौरान साहित्यिक व्यक्ति को पहाड़ की चोटी पर बिठा देता है और अगले ही पल माइक मांगकर साहित्यकार का भ्रम भी तोड़ डालता है। मंच से माइक छोड़ना और विदाई में बिटिया को कार में बिठाकर विदा करने में एक जैसे ही भाव एवं तरंगें उठती हैं।

यदि कार्यक्रम में आठ लोगों को बोलना है तो प्रथम के बाद शेष सात, मन ही मन अपना पाठ करते और सुनते हैं। जो कार्यक्रम दे चुके होते हैं उनको निकलने की व्यग्रता श्रोताओं से भी अधिक होती है और जिनको अभी माइक नहीं मिला वो तन्मयता के साथ कार्यक्रम में बने रहते हैं।

आयोजक पूरे कार्यक्रम में न जाने कितनी बार अपनी गर्दन घुमाकर पीछे देखता (संभव है कि गिनता भी हो) है। बस अन्त तक श्रोता कुर्सी पर टिके रहें ऐसी कामनाएँ न जाने कितनी बार बलवती होतीं हैं। यदि कुर्सी के हत्थे पर एक हथकड़ी का प्रावधान हो जाता तो आयोजक मंडल को बड़ी आसानी हो जाती कम से कम जो गिरफ्तार हो जाते उनके भागने की टेंशन तो नहीं रहती।

मित्रों! किसी गांव में नाच आ रही हो तो देखने वाले नदी नाला पारकर के चले आते हैं। रजाई कम्बल ओढ़कर सीटी बजाते हैं. यहाँ तक कि पेड़ की मोटे शाखे-डालियों पर भी चढ़कर देखने वाले मिल जायेंगे। मुशायरे में भी किसी जनाना कलाकार को देखने वालों की लम्बी कतारें लग जातीं हैं लेकिन हमारे साहित्यिक कार्यक्रमों में श्रोताओं का अकाल सच एक चिंतनीय विषय है।

रिवेश प्रताप सिंह

गोरखपुर

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