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फिर एक कहानी और श्रीमुख "भरोसा"

फिर एक कहानी और श्रीमुख    भरोसा

ट्रेन जब तमकुही रोड टीसन पर रुकी तो खिड़की से बाहर झांक कर देखा उसने... सबकुछ बदल गया! आदमी तो आदमी पेंड़-खुट भी नहीं पहचाने जा रहे... पता नहीं यह माटी भी पहचानेगी या नही... धोती के कोर से उसने भर आई आँखों को पोंछा और सीट पर बिछाया हुआ अपना कम्बल उठा कर लपेट लिया। उसे अगले स्टेसन पर उतर जाना था।

पच्चीस साल कम नहीं होते। उसे याद आया, इसी तमकुही रोड टीसन के सामने की बँसवाड़ी से पुलवँश पकड़ कर जब उसने पूरा बाँस उखाड़ दिया, तो गांव के छोकड़े उसे घर तक कंधे पर उठा कर ले गए थे। दस कोस के जवार में ऐसा कोई पहलवान नहीं, जिसे दो चार बार उसने चित न किया हो। का कहें, यही पहलवानी खा गयी उसकी जिंदगी...

इकलौता बेटा था अपने माँ-बाप का, सात बेटों के मर जाने पर आठवां हुआ था वह, सो उसकी माँ ने उसका नाम कन्हैया रखा था। बाप दस बीघे खेत का मालिक था सो खाने-पीने की कोई कमी नहीं थी। हमेशा पाँच-सात जोड़ी गायें रहती थी दुआर पर, दूध पी कर पट्ठा हो गया था कन्हैया। बाप की इच्छा थी कि बेटा पहलवानी में नाम करे तो उसने नाम किया भी। तमकुही, परड़ौना, फाजिलनगर, कुशीनगर और जाने कहाँ कहाँ के दंगल में पंजाबी पहलवानो को पटक-पटक के कमर तोड़ता रहा था कन्हैया! जिले-जवार के पहलवानों का आदर्श था वह।

उस जमाने में हर रईस के यहां दो चार पहलवान रहा करते थे। हाथी और पहलवान ही रईसों की शान थे। जिसके यहाँ जितने पहलवान, वह उतना बड़ा आदमी। जिसके यहाँ हाथी, वही बड़ा अमीर। सो तमकुही के बाबू बिनेसरी राय ने पूरे सम्मान के साथ उसे अपने यहाँ स्थान दिया। बेटे की तरह मानते थे बाबू साहेब... पांच गायों का दूध अकेले पीता था उनके यहाँ कन्हैया। वह ऐसा युग था जब सौ में नब्बे मनई निष्ठावान हुआ करते थे, एक ही कोई धूर्त होता था। कन्हैया भी मालिक के प्रति निष्ठा निभाता था।

बाबू साहेब ने ही कन्हैया की शादी कराई और खुद अपने महरजवा हाथी पर बैठ कर उसकी बारात में गए थे। बियाह के बाद बाबू साहेब ने छह महीने की छुट्टी दी कन्हैया को, "जाओ अपने गांव घर में रहो, तुम्हारा तलब-तनखाह समय से तुम्हारे घर पहुँच जायेगा।"

कन्हैया जब गाँव में आता तो गाँव के सभी नवछेड़िया लड़कों का नायक बन जाता था। लड़के उसके ऊपर भिड़े रहते, "भइया तनिक धोबियापाट मारना सिखा दो न... भइया उस भोरे वाले मउगा पहलवान को कइसे पटके थे तनिक बताओ न..." कन्हैया दिन भर लड़कों को दाव सिखाता रहता। छह महीने की छुट्टी में उसके दिन बड़े मजे में कट रहे थे।

कन्हैया के गांव के बड़ेआदमी थे पंडित टिकाधर मिसिर। कन्हैया के बाप के गुरु-महाराज... कन्हैया पर बड़े दिनों से नजर थी उनकी, सो एक दिन कह पड़े- "का कन्हैया, कबतक जी हजुरी करते रहोगे रायसाहब की? अरे हमारे यहां आओ अपना घर है।"

कन्हैया ने मुस्कुरा कर कहा- "रायसाहब का साथ तो इस जनम में नही छुटेगा महराज जी, उनका नमन खा लिया है..."

पंडीजी को कन्हैया से ऐसे दो टूक उत्तर की आशा नहीं थी, बात लग गयी पंडीजी को।

चार-पाँच दिन के बाद जब कन्हैया अपने टोले के चौपाल में बैठा बीसों लोगो के साथ बतकही कर रहा था, तभी पंडीजी पधारे और बोले- "ए कन्हैया, एगो निहोरा है, संकारोगे?"

"बै महराज जी! निहोरा क्या, आदेश करिये।" कन्हैया ने लपक कर उत्तर दिया।

- "देखो ना, एगो बड़ी जरूरी काम से गोरखपुर जाना है। जानते ही हो अब चोर-चाइ का जमाना है, तो डर लगता है। सोचा तुमसे ज्यादा भरोसा किस पर करें, यह मोटरी रख लो, घर का सब गहना-गुरिया है इसमें। फिर जब वापस आऊंगा तो ले जाऊंगा।"

"आरे महराज आप निफीकिर हो कर जाइये।"

महराज जी निफ़ीकिर हो कर चल गए। शाम को अँधेरे में चुपके से घर आ कर बोले कन्हैया से- "गोरखपुर जाना तो था पर गए नहीं, लाओ मेरा सामान दे दो।"

कन्हैया ने गठरी दे दी और पंडीजी चले गए।

चार पांच दिन के बाद उसी चौपाल पर फिर आये पंडीजी और बोले- "ए कन्हैया! गोरखपुर से घूम आये, अब लाओ मेरी गठरी दे दो। हाँ इतने दिन की रखवारी के लिए धन्यवाद।"

कन्हैया का खून सूख गया। उसने गिड़गिड़ाने की कोशिश की, पर सुने कौन? सबने कहा- महराज जी भला झूठ बोलेंगे, इसी के मन में पाप समा गया है।

उस रात कन्हैया के पास गांव छोड़ कर भाग जाने के आलावा और कोई चारा नही था। घर छोड़ते समय एक माह की गर्भवती पत्नी से बस इतना कहा था- मैं आऊंगा जरूर, भरोसा रखना...

पर अपने दिलाये गए भरोसे पर खरा उतरने की हिम्मत नही हुई उसकी! इन पच्चीस सालों में दो बार वह गांव तक आ आ कर लौट चूका था।

इतने दिनों तक वह कहाँ रहा और क्या किया यह याद रखने की इच्छा नहीं उसकी, पर अब वह थक चूका था। उम्र अभी 48 या 50 की होगी पर 70 के बूढ़े जैसा लगता था कन्हैया...

ट्रेन दुदही टीसन पर पहुँच चुकी थी। गाड़ी से उतर कर वह पैदल हीं गाँव की ओर बढ़ रहा था। वह चाहता था कि रात हो जाय तो अँधेरे में घुसे अपने गाँव में... पर कदम रुकना नही चाहते थे। अब कुछ ऐसे चेहरे दिखने लगे थे जिन्हें अंदाजा लगा कर पहचान पा रहा था वह। भैंस चरा कर वापस लौटते एक बुढ्ढे को देख कर अनायास निकला उसके मुह से- मथुरा!

वह बोल पड़ा, ऐ मथुरा! रै मथुरिया...

भैंसवाह ने ध्यान से देखा उसे, "मथुरिया तो बस मुझे कन्हैया कहता था, तुम कन्हैया तो नही? हाँ तुम कन्हैया ही हो..." उसने लपक कर उसका हाथ पकड़ा। अब कन्हैया चुप था, दोनों थस्स से जमीन पर बैठ गए।

मथुरा ने बताया- तुम्हारे जाने के तीन चार-पाँच साल के बाद ही तुम्हारे बाबूजी मर गए, पर अंतिम बेला तक कहते रहे "मेरा कन्हैया चोर नही है।" दो तीन साल हुए, तुम्हरी माँ भी गुजर गयी।

कन्हैया की आँख बह चली थी, बोला- "और?"

और... चार पांच साल पहले टिकाधर मिसिर के लड़कों ने तुम्हारा खेत वापस कर दिया। सब को बताया उनलोगों ने कि तुमने बेईमानी नही की थी। कोढ़ी हो कर मरे टिकाधर मिसिर।

- और?

-और जानने के लिए घर चलो। हाँ वो दूर खेत में जो लड़का कुदाल चला रहा है न, तुम्हारा बेटा है...

कन्हैया ने देखा दूर खेत में कुदाल चलाते नौजवान को, पीछे से लगा कि जैसे कन्हैया खुद चला रहा हो कुदाल। बोला- मथुरा, ये मेरे ही खेत हैं न?

हाँ रे, तेरे ही हैं।

और इसकी माँ ?

बीसों बार आये तेरे ससुराल वाले उसे बुलाने पर नहीं गयी। कहती रही, "वे कह के गए हैं कि आऊंगा, भरोसा रखना। मैं नही जा सकती।"

कन्हैया ने मुह में कम्बल का कोना ठूस लिया था पर रुलाई का वेग रोक नही पा रहा था।

लगभग दौड़ते हुए पहुँचा अपने घर। देखा एक बुढ़िया धान फटक रही थी।

आहट पा कर देखा उसने अजनबी की ओर, और देखती रही देर तक...

उसके मुह से बस इतना निकल- तहार भरोसा सारा जिनगी खा गइल हो सुगउ... और चिंघाड़ उठी।

सर्वेश तिवारी श्रीमुख

गोपालगंज बिहार

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