भोजपुरी कहानी - माट्साब

भोजपुरी कहानी - माट्साब

माट्साब बो अपना सुत्ती लूगा के अंचरा से लोर पोंछत दलानी में कुछ एहींगा जोहे के उपक्रम करे लगली, बाकि माट्साब के करुण क्रंदन बाहर ले सुनाव. माट्साब चिल्लात रहले "हमके जनि काट ए बड़कू के माई, हम तहार कुल्ह बात मानब, बाकि हमके जिए द हो ! अरे बाप हो.....! अब बुझाता तलवार जोहे गईल बिया, आज हमके मुयाईये के छोड़ी .....अहहाहा....."

अबोध बालक नियर माट्साब के ई क्रंदन इतना करुण रहे , जे अगर केहु पाषाण होखे उहो पानी हो जाओ.

बोधा, बोधा बो, धरीछन, लोचन काका आ बहुत गदा-गेदी लईका तमाशा देखे माट्साब के दुआरे जुट गइलन सं . लोचन काका माट्साब बो से पुछले, "का भईल ए बड़कू के माई, मास्टर के फेर कुछु लउकता का?" माट्साब बो के धैर्य जवाब दे गइल आ ऊ फूंका फार के रोवे लगली. " का कही काकाजी, का जाने कौन हँकले बिया, आज हफ्ता भर हो गइल, इनका इहे बुझाता जे हम इनका के मुवावे के जतन कर तानी . झाड़ू हाथ में ले तानी त कहतारे जे ना हमके गडांसि से जनि काट हम तहार कुल्ह बात मानब." माट्साब बो के रोवाई अवरू घन होखे लागल. बोधा बो उनका के अंकवारि में ध लेहली, धीर धरावे लगली, अपनहुँ लोर-झोर हो गइली. माट्साब के क्रंदन तानी धीरात रहे, बुझात रहे लइकन नियर रोवत -रोवत हार थाक गईल रहले, बाकि तबो बीच-बीच में कबो रोवे लागस.

माट्साब बो के सुत्ती एकरंगहि साड़ी में कव गो, कव रंग के पेवन लागल रहे, गिनती कईल मुश्किल रहे. घर बुझाव जे रख-रखाव बिना, अब ढहल कि, तब ढहल. दलानी में अनाज के बोरा के कवनो कमी ना रहे, लेकिन ई साफ बुझा जाव जे ए घर में कवनो कमाइनिहार ना रहे. लेकिन हरमेसा से यह दुवार-घर के इहे स्थिति ना रहे. माट्साब अपना दिन में जवार के सबसे पढ़ल-लिखल लोगन में एक रहले. उनका विद्व्ता के प्रमाण दिहल जाव, ई कहल जाव जे माट्साब के पढ़ावल क जाने आईएएस, पीसीएस बन गईल लो. माट्साब के लोग बड़ा आदर देव्, आ माट्साब के व्यवहारो आदर के लायक रहे. माट्साब के नाम जनक नारायण मिसिर रहे.कलकत्ता में चटकल में रहले, साहेब से अनबन भईल, घरे खेती बारी रहे,आत्मसम्मान अभिमान के बारीक़ लाइन ना बुझाव, लागल कि हमरा आइ.ए., इंग्लिश वाला के ई दसवा पास डिप्लोमा साहेब काहे डाँटि? बस , नौकरी के लात मरले, गांवे वापस, खेती-बारी, घर-दुवार. केहू कहल कि जनक बाबा हमरा लइकवा के तानी टिबिसन पढ़ा दीं, बस सांझे-बिहाने दुवारे प, दालान में बोरा बिछा के क्लास लागे लागल. माट्साब के पढ़वला के हुनर जबरदस्त रहे, जल्दिये ख्याति दस गांव में फईल गइल, लइकन के पढ़े खाती मेला लागे लागल. कुछ फीस देव्, कुछ खाली तारीख देव्, बाकि माट्साब सबके बराबर पढ़ावस.

माट्साब के दू गो संतान रहले, एगो बड़कू, जे नौवां में पढ़त घरी रिसिया के कहीं भाग गइले, आज ले उनकर कवनो पता ना लागल, बाकि माट्साब बो के भरोसा रहे जे बड़कू जहा बाड़े, खूब निमन बाणे, आ कबो माई-माई कहत केनियो से, बड़का आदमी बन के वापस आ जईहे, सब दुःख ओरा जाई. एगो बेटी रहे, सुनरी, ६ बरिस के रहे, खेलत घरी कवनो कीरा काट लेहलस, ओकर देहांत हो गईल.

लोग कहे जे माट्साब के घरे कवनो भूत-दूत बा, उहे बड़कू के भगा दिहलस, सुनरी के मुवा दिहलस, कई लोग सोखइती-ओझइती, हवन-फूंका के सलाह दिहल लेकिन माट्साब अड़ियल रहले, केहू के ना मनले. कहें जे "जियता बरहम के मुवता भूत का करि?" माट्साब के हिम्मत आ धैर्य के सभे कायल रहे, कहो जे गजब करेजा माट्साब के, ना लइका के पराईला से दुखी भईले, ना बेटी के मुवला से. एइसन ना रहे जे माट्साब के दुःख ना होखे , बाकि उनकर अभिमान कबो उनके फूंका फार के रोवल त दूर सिसकहूँ ना देहलस. आ आज, उहे माट्साब ओंगा रोव तारे , जेंगा केहू रोवालहिं ना होई. बोधा कहेले "भूतवा इनके एकदम चपेटा में ले ले बा ." गांव के लोग बिगन सोखा के लगे गईल, उ कहले कि ममिला गहिर बा, उपाय में एक हज़ार ले खरच होई.सभे हाँथ खिंच लिहल, लइकन के पढाईयो के फीस ना देबेवाला ओझइती के खर्चा दी नूँ भला ?

माट्साब के, उनका ऊपर बइठल भूतवा, बद से बदतर करे लागल. अब त ऊ सबका से डेरास, हरमेसा चौकन्ना रहस, बुझाव जे जंगी जॅंगल के हरिणा हउवन, आ बाघ के मान लगहिं बा, बघवा अब कुदल, कि तब कुदल. खान पियन सब छूटल जात रहे, लोग कहो जे अब ढेर दीं बचिहे ना.

अबे उनका दालान में बइठ के समस्या समाधान के बहाने बोधा, ओमकार आ दू-तीन जाना अवरू, टाइम पास करत रहे लो, तले एगो नौ छेड़िहा आ के सब जाना के गॉड लागलास, बोल लस जे, " मास्टर बाबा कहा बानी?"

"तू के हो?" ओमकार पुछले.

"हम रतन, भीखम सिंह के बेटा, दिल्ली रहिले."

"भीखम सिंह के बेटा, उ त दिल्ली में डाक्टर बाणे , एम्स में!"

"हं. . हमी हईं चाचा, मास्टर बाबा कहाँ बानी?"

सभे साइड हटी गइल, रतन भीतर गइले, अंगना में मैल बिछवना डालल खटिया प माट्साब लेटल कुछ बुदबुदात रहले, आंख अजीब लेखा भइल रहे, देंहि ऐंठ गइल रहे. रतन गोड़ छूके गोड़ लागले. माट्साब हरक गइले, "कवन ह रे? छुव जन , मुवाव जन" माट्साब हाथ जोड़े के कोशिश करे लगले. रतन हाथ ध लेहले.

"माट्साब हम भीखम बाबू के रतनवा!" रतन माट्साब के हाथ अपना हाथ में भींच लेहले.

माट्साब अचकचा गइले, लेकिन छुवन में एतना नमी रहे जे हाथ छोड़वाले ना. निशब्द केतना देर गुंजत रहे...अब माट्साब के हाथ के दबाव बढे लागल, आँखि के कोर में धार बढे लागल.

"रतन..हो..रतन !...बुझाता भूतवा हमरो के मुवाई!" माट्साब अपना सबसे प्रिय शिष्य के चिन्ह लेहलन. बड़ा कातर नज़र रहे, ओमे गोहार रहे, बचावे के, तनी चकम बाकि रहे जिनगी के.

" रउरा कुछ ना होई माट्साब" रतन दालान में झकलन, उनकर बेग उन्हे रहे, एगो लइका से इशारा क के मंगवले.ऊ मनोचिकित्सक रहले. दू खल के गोली निकाल के पानी मंगवले, अपने हाथे, माट्साब के सहारा देके खिया के पानी पियवले. थोर देर बाद माट्साब के आंख मुनाये लागल, चेहरा प शांति के भाव आवे लागल.

"इंहा के क दिन बाद सुतल होखब." माट्साब बो कहली.

रतन बाहर अइले. बोधा कहले जे "बाबू कवनो मंतर जाने ल का?"

"ना चाचा, माट्साब के हाल भैया परसों फोन प बतवले , हम डाक्टर हईं, इंहा के हाल सुनके रोकाइल ना, लच्छन पुछले रहनी भैया से, यह से दवाई ले के आईल रहनी हं."

रतन आगे कहले, "लोग भूत प्रेत जे के कहेला ऊ असल में मन के रोग होला, जवन माट्साब के भइल बा, ए के स्क्रिजोफ्रेनिया कहल जाला, अभी हम आराम खाती कुछ सामान्य दवाई देले बानी, जा तानि सिवान त विशेष दवाई ले आईब."

तीन दिन बाद....माट्साब दुवरा कुर्सी प बइठल रहले, मलिकाईन नहवावत रहली, सामने रतन बइठ के सेव छिलत रहले. माट्साब उनके बड़ा स्नेह से देखत रहले. अब दलानी में रौनक रहे....माट्साब के आंख में अंजोर रहे!

-अश्विनी कुमार तिवारी "गीत"

सिवान, बिहार

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