फिर एक कहानी और श्रीमुख " हिम्मत"

फिर एक कहानी और श्रीमुख   हिम्मत

ए सरऊ, हमार तिलकवा ना चढइबs हो..."

लगभग सत्तर साल के बुजुर्ग पाण्डेयजी बाजार में बैगन बेंच रहे बुजुर्ग खटिक से टिभोली मारते हैं। बूढ़ा मुस्कुरा कर जवाब देता है- चढ़ जाइ चढ़ जाइ, अब त जाड़ के दिन आवते बा, ढेर बूढ़ लो के तिलक चढ़ी अब...

पाण्डेयजी मुस्कुराते हुए झिड़क देते हैं- दूर सरवा, हम अभिन ना मुएब रे, चल हई डेढ़ किलो भंटा जोख...

बाजार में सब्जी खरीदने आया हूँ। बाजार में मन्दी है आजकल। एक सप्ताह पहले तक साठ रूपये किलो वाला गोभी एकाएक दस रूपये किलो बिकने लगा है। पचास वाला परोरा पच्चीस में, आलू छः रुपया किलो। और साग वाले तो मूली, सरसो और पालक दो दो रुपया कीलो बेच रहे हैं, फिर भी बाजार में खरीददार नही हैं।

मैं बाजार में हमेशा उन छोटे सब्जीवालों से सब्जी खरीदता हूँ, जो खुद अपने खेत की फसल बेचने आते हैं। कभी बड़े दुकानदारों से सब्जी नही खरीदता। गांव का गृहस्थ होने के नाते इतना तो जानता ही हूँ, कि यदि किसी ब्यवसाई से गोभी ख़रीदे तो दस में से सिर्फ छः रूपये किसान को मिलेंगे, पर किसान से खरीदने पर उसे दस के दस मिलते हैं।

मेरे बाजार में एक बुड्ढा बैगन बेचने आता है। पड़ोस के गांव का ही खटिक है, परले दर्जे का खड़ूस, किसी से सीधे मुह बात नही करता। कोई अगर दाम कम करने की बात करे तो ठाँय से जवाब देता है- लेना है तो लीजिये नही तो जाइये, चवन्नी कम नही करेंगे। पर बैगन हमेशा ताजे और साफ सुथरे लाता है सो लोग बाग उसके घमंड को झेल लेते हैं। वैसे बुड्ढा मुझसे कभी टेंढ़ नही बोलता, क्योंकि मैं कभी भी सौदे का दाम नही पूछता। सब्जी तौला लेने के बाद वे जो मांगते हैं, चुपचाप दे देता हूँ। वैसे भी यदि एक दिन के बाजार में खूब मोल भाव कर के ख़रीदा जाय तो ज्यादा से ज्यादा दस रूपये बचेंगे। फिर कौन जाय गरीबों से.......

तो बुढ़वा पिछले बाजार को बैगन पच्चीस के भाव बेच रहा था, आज हमको देखते ही बोला- आइये बाबा, आज दसे रुपया किलो है।

मैं मुस्कुराते हुए पूछ पड़ता हूँ- आपका तो धंधा ही चौपट हो गया भगत जी, दस के भाव बेचने में क्या पोसायेगा।

भगत भी मुस्कुरा उठा है, कहता है- नोट बंद होने से सब चौपट हुआ है बाबा, कोई बात नहीं दस दिन में सब ठीक हो जायेगा।

अब मैं भी मजे लेने के मूड में आ गया हूँ। चुपचाप एक दाव फेकता हूँ- मोदी जी तो तुम लोगों को बड़ी कष्ट दिए भगत जी, क्यों?

बूढ़ा जैसे झिड़क देता है मुझे- भक महाराज! मोदी साहेब भी ई सब देश के लिए ही न किये हैं। अब इसके लिए चार दिन का कष्ट ही होता है तो क्या दिक्कत...

मैं एक तीर और छोड़ता हूँ- अरे उ सब तो ठीक है, पर गरीबों को तो बहुत कष्ट हो रहा है।

बूढ़ा अब तराजू नीचे रख कर पूरी तरह बहस के मूड में आ चूका है। वैसे भी उसकी दुकान पर और कोई ग्राहक नही है। कहता है- तो इसमें नया क्या है बाबा? देश के लिए कष्ट सहने की हिम्मत गरीबों के पास ही होती है, आप जैसे बड़े लोगों के पास इतनी हिम्मत कहाँ।

बूढ़ा पता नही किस नजर से मुझको बड़ा आदमी देख-समझ रहा है। शायद मेरा ब्राह्मण होना मेरे बड़े होने की निशानी है, वही घोषित सामंतवाद। अब मैं किससे कहूँ कि सामंतवाद की अर्थी के फूलों को सूखे हुए युग बीत गए।

बुढ़वा बकबकाता जा रहा है- आप तो पढ़े लिखे बिद्वान हैं बाबा, तनिक बताइये तो आजादी की लड़ाई में कितने अमीरों के बच्चे फाँसी पर चढ़े थे? भगत सिंघ, चनरसेखर आजाद, गान्ही बाबा, ई लोग भी तो गरीब घर के ही लड़के थे न?

मैं बात काटता हूँ- अरे नही भगत जी, अमीरों का भी कम योगदान नही था।

बुढ़वा टेढ़ी मुस्कान छोड़ कर जैसे व्यंग मार रहा है- हाँ बाबा, सिंधिया जैसे अमीरों की कहानी भी सुने थे हम। झाँसी के रानी को उहे न पकड़वाया था सब। आजकल उनके बच्चे बाले देशभक्ति बतियाते हैं।

मुझे कोई जवाब नही सूझ रहा है, मैं टालने के लिए कह देता हूँ- अरे आप ई सब इतिहास का बात कइसे जानते हैं भगत जी?

भगत खिलखिला उठा है, कहता है- हम लोगों की लडिकाईं में बाबा-इया आजादी के लड़ाई की कहानी ही सुनाते थे बाबा। अब तो कोई सुनता सुनाता ही नहीं, सब टीबी देखने में मगन हैं।

मैं अब ऊब उठा हूँ। बात खत्म करने के लिए पूछता हूँ- मतलब तुमको कोई परेशानी नहीं?

- कोई परेशानी नही है बाबा। जब देश की बात आये तो हम जैसे गरीब सबसे आगे रहेंगे। हाँ हमारे नाम पर अपना घर भरने वाले लोग बड़ी बेचैन हैं।

-मतलब आप मोदी के साथ हैं?

- हम किसी मोदी सोदी के साथ नही हैं बाबा, हम तो मोदी को भोट भी नही दिए थे। हाँ देश के लिए जब कोई अच्छा काम करेगा तो हम सपोट करेंगे। हाँ उ अलग बात है कि हमारे सपोट बिरोध से का होता है, होता तो वही है जो बड़े लोग चाहते हैं। हम अगर साल के ग्यारह महीने अपने भाग्य से दुःख भोग सकते हैं तो एक महीना देश के लिए भी सही...

बुढ़वा जैसे मुझे धो चूका है। मुझे अब बदला लेना है। मैं पूछता हूँ- अच्छा भगत, भगतायिन कैसी है?

बुढ़वा मुस्कुरा के कहता है- भगतायिन बड़े सुख में है बाबा। मेरे साथ बत्तीस साल तक दुःख काटने के बाद सात साल से भगवान जी के यहां सुख भोग रही है। मेरे करम में अभी और भोगना लिखा है शायद।

मैं देख रहा हूँ बुड्ढे की आवाज बैठने लगी है। मैं बात बदलता हूँ- भगत जी, न हो तो बियाह कर लो।

बुढ़वा झूठा गुस्सा दिखाते हुए कहता है- बैगन केतना चाहिए ई बोलिये बाबा। ढेर तमाशा मत कीजियें।

मैं उसे एक किलो तौलने के लिए कह कर उसके मुह की तरफ देख रहा हूँ। मन के किसी कोने से जैसे कोई कह रहा है- ठीक कहता है बुढ़वा। देश के लिए त्याग कर सकने की हिम्मत गरीबों के पास ही है। हम जैसे लोग सिर्फ अपने बिचारों के पक्ष में झूठा तर्क गढ़ सकते हैं। त्याग कर सकने की हमारी औकात नहीं।

सर्वेश तिवारी श्रीमुख

गोपालगंज, बिहार।

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