छठी मईया दिही न अशीष..

भोरे भोरे आंख मिचमिचाते ही सुनने में आया कि आज छठ है । उहे छठ जिसके लिये साल भर का इंतेज़ार करते थे कभी । घाट घेरने की जल्दीबाजी, शान वाली मोहल्लेबाजी, रंगबिरंगी पतंगबाजी, अल्हड़ लफ़्फ़ाजी और जब थोड़े बड़े हुये तो गुलाबी इश्कबाजी ।

सांझ में चहकना - भोर में अलसना, गुड़ वाला ठेकुआ - रसीली ऊख, गंगा जी की कुनकुन - पिता जी की गोद, सूरजमल की किरन - पंडी जी का घोष, प्रसादी की महक - पेट का चोर ....न जाने कितनी यादें हैं , क्या क्या गिनाऊ ?

जमाना सादा टीवी से आगे, बहुत आगे निकलकर 5g स्मार्ट टीवी पर आ चुका पर जुड़ाव तो बस घाटों से ही कर पाया है मन, छठी मईया की आस्था वहीं के वहीं अटकी है आज भी ।

रमेसर, महेश, सदानंद फिर से नेवडा-दिल्ली की फैक्ट्रियों के मालिक से लड़कर जनरल बोगियों में खुद को घसीटते छठी माई ख़ातिर आ रहे हैं । खड़े होने की जगह नहीं लेकिन बाबू जी की धोती, चुनमुन का कपड़ा, टिंकुआ की माई का पूजा वाली साड़ी सब एहतियात से सीने से सटे पड़े हैं ।

विधु काका नया सिलिक का कुर्ता सिलवाये हैं छठ घाट ख़ातिर, एयरमैन बड़का भैया भउजी को लेकर आये हैं गांव छठ मनाने, मोहल्ले के नयका किरिन उत्तम, पीयूष, सुधीर लोग भी तो कॉलेज से भाग आये हैं बस 2 दिन की छुट्टी में, सुमनी, प्रीतिया, चंदवा सब बड़ी हो गई हैं और अबकी नयका फैशन वाला फ्रॉकसूट किनवा के ही मानेंगी, काकी लीपा पोती में गोहरा रहीं छठी माई को तो दादी ललका गेंहू बिन रहीं ...पर सबके आंख में छठी मईया के आने की चमक साफ दिखती है ।

छठी मईया दिही न अशीष...🙏

हाँ इनसब के बीच एक हम जैसे भी लोग हैं जिन्हें आजतक ये न पता चला कि 'ऑफिस हमें न छोड़ रहा या ऑफिस को हम '... साल संवत के दिन हम इत्ते दूर क्यों हैं... और माटी वाली जिंदगी अब कब जियेंगे...।

सच ही सुने थे लईकाई में कि बड़ी नसीब से छठ मइया नसीब होती हैं

संदीप तिवारी 'अनगढ़'

"आरा"

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