फिर फिर नन्द न उत्तर दीन्हो...

फिर फिर नन्द न उत्तर दीन्हो...

गोकुल में जैसे मृत्यु की उदासी पसरी हुई थी। मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी भी बोलना भूल गए थे। गायें अपने अपने खूंटों पर निश्चेष्ट पड़ी हुई थीं। पक्षियों का कलरव शांत था। शांत पड़ी थी यमुना, शांत पड़ा था गोवर्धन पर्वत, शान्त पड़ी हुई थी गोपियां, शांत थे सब ग्वालों के बालक, जैसे गोकुल की आत्मा निकल गयी हो। जैसे पूरी प्रकृति ही सो गई हो।

ईश्वर जिसका सर्वस्व छीन ले, उसे अथाह सहनशक्ति दे देता है।

तिजहरिया हो आयी थी। उदास पड़े गोकुल में सबसे पहला स्वर फूटा यशोदा का, उन्होंने ग्वालों को हाँक लगाई-" अरे सब सो गए हो क्या? आज गौवें चराने नहीं जाना क्या किसी को? चलो निकलो सब के सब..."

दूर किसी ने उत्तर फेंका- आज जाने की इच्छा नहीं काकी! कन्हैया के बिना मन न लगेगा।

यशोदा ने एक मीठी झिड़की दी-"मन नहीं लगता तो लगाना सीखो। समय किसी के लिए अपनी चाल धीमी नहीं करता। कन्हैया जहाँ का था वहाँ गया... उसके लिए क्या उदास होना? चलो निकलो यमुना की ओर.."

"यह तुम कह रही हो काकी?" ग्वाले ने प्रश्न छोड़ा।

यशोदा का स्वर काँप उठा, पर उन्होंने स्वयं पर नियंत्रण करते हुए उत्तर दिया, "मेरे कहने न कहने से क्या होता है रे! उसको जाना ही था, सो चला गया। मेरा होता तो जाता क्या? छोड़ तू, अबसे तू ही मेरा कन्हैया है, तुम सब कन्हैया हो। चलो उकड़ावो गायों को..."

बालक यशोदा के निकट आ गया, "तनिक पुनः कहो तो काकी, क्या सचमुच हम ही कन्हैया हैं?"

यशोदा ने कोई उत्तर नहीं दिया तो बालक ने उनकी आँखों में झाँक कर कहा- 'क्यों स्वयं को ठग रही हो काकी? इस गोकुल में सबको ठगने के लिए एक ही आया था, सो ठग कर चला गया।'

यशोदा चुप रहीं। उनका धैर्य जैसे टूट रहा था।कुछ पल बाद बालक ने उदास भाव से कहा- अच्छा छोड़ो! लाओ आज कन्हैया की बछिया को भी हमहीं चरा लाते हैं।

बच्चे ने अपने मित्रों को हाँक लगाई, सब अनमनाते हुए अपनी-अपनी गाय खोल कर यमुना की ओर चले।

यशोदा वहीं दुआर पर बैठी रही...अनमनी सी, बहुत समय तक।

अचानक बैलों की घन्टी की टनटन से उनकी तन्द्रा भंग हुई, उन्होंने सर झुकाए हुए ही कहा- "अरे कन्हैया! इस दुष्ट बछड़े की घन्टी खोल कर रख दे, इसकी टनटन जरा भी नहीं सुहाती मुझे..." किन्तु शीघ्र ही उन्हें स्मरण हुआ कि अब कन्हैया कहाँ..? उन्होंने सर उठा कर देखा, कन्हैया को मथुरा चहुँपा कर वापस लौटे नन्द चुपचाप गाड़ी से बैलों को खोल रहे थे। यशोदा उनको देख कर दौड़ पड़ी। लपक कर पूछा- "क्या हुआ?"

नन्द बाबा के पास कोई उत्तर नहीं था। वे चुप रहे...

"बोलते क्यों नहीं? कान्हा ठीक तो है न?" यशोदा ने जैसे तड़प कर कहा।

नन्द बाबा ने फिर कोई उत्तर नहीं दिया।

यशोदा चीख पड़ीं- "अब क्या मेरे प्राण ले कर ही बोलेंगे? बताते क्यों नहीं, कहाँ छोड़ आये उसे?"

नन्द बाबा ने उत्तर देने के लिए मुह खोला पर स्वर नहीं फूटे। उनकी आँखे बरस पड़ीं...

यशोदा सबकुछ समझ कर चुप हो गईं। कुछ पल बाद मद्धिम स्वर में कहा- मैं व्यर्थ में ही चिंतित हो जाती हूँ, वहाँ भला उसे क्या दुख होगा! उसके मइया-बाबा हैं ही। और लोग तो कहते हैं कि वह भगवान है, फिर उसके लिए कैसी चिन्ता? आप घर मे आइये थक गए होंगे।

नन्द बाबा ने कोई उत्तर नहीं दिया, उनकी आँखें अब भी झर रही थीं। वे चुपचाप घर में घुस आए।

यशोदा ने उन्हें दोनों हाथों से पकड़ कर कहा- उसे ले जाते समय तो आप मुझे सान्त्वना दे रहे थे, अब आप ही टूट गए? छोड़िये न, यह तो अब जीवन भर दुख है।

नन्द बाबा के मुख से पहली बार शब्द फूटे, "तुम माँ हो न यशोदा, जब चाहो तब रो सकती हो। पिता तो इतना निरीह होता है कि रो भी नहीं सकता।"

यशोदा ने नन्द बाबा से लिपटते हुए कहा- "ईश्वर ने हमारे आँगन में आठ साल तक लीला की थी महाराज! स्वयं हमारा पुत्र बन कर आया था, उसका कुछ मूल्य तो लेगा न? चलिये, अब जीवन भर रो कर उसका ऋण चुकाना है। अभी चुप होइए, पूरा गोकुल हमारा मुह देख रहा है। हम टूटे तो सब टूट जाएंगे।"

नन्द बाबा कुछ पल तक निहारते रहे यशोदा को, फिर ग़मछे के कोर से आँख पोंछ कर गाय की नाँद में पानी डालने चले।

यशोदा उन्हें टुकुर-टुकुर निहारती रही। अचानक उनके मुह से निकला- "सब कुछ लूट ले गया रे छलिया! कुछ नहीं छोड़ा।"

सर्वेश तिवारी श्रीमुख👍

गोपालगंज, बिहार।

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