दरार..... : रिवेश प्रताप सिंह

दरार..... : रिवेश प्रताप सिंह

ईश्वर की अनुकंपा, नियमित दवाइयों के सेवन एवं नपी-तुली नियमबद्ध दिनचर्या के बल पर पिताजी लगभग अस्सी वर्ष की अवस्था में भी बिल्कुल स्वस्थ हैं।

वैसे मानव का शरीर एक परिवार की भांति ही होता है। शरीर का प्रत्येक अंग परिवार के सदस्यों की तरह कार्य करता है, और यह शरीर रूपी परिवार बिना किसी परेशानी के फलता-फूलता है। यह भी सही है कि जैसे परिवार के समस्त सदस्यों का रवैया एक जैसा नहीं होता वैसे ही शरीर के अंगों में भी समय-समय पर खट-पट लगी रहती है। जो परिवार के स्वास्थ्य और सौन्दर्य को प्रभावित करते रहते हैं।

पिताजी भी इसी खट-पट के शिकार हुए और साठ के बाद उनके केश और दाँतों ने अपना रवैया नकारात्मक कर लिया। दो चार वर्ष में मूल दाँतों ने अपने पदों से वी.आर. एस. ले लिये। मुख कार्यालय से अचानक बड़ी मात्रा में त्यागपत्र से सारे फाइल पेंडिंग में चले गये। सामान्य फाइलों को तो सरकाना आसान था लेकिन जटिल फाइलों का निस्तारण कठिन हो गया। पुन: परिवार में मंत्रणा और परामर्श के साथ संविदा पर नई भर्ती के रुप में पत्थर दांतों की भर्ती करायी गई। एक बार कार्यालय पुनः रौशनाज़ हुआ। भोजन सम्बन्धी कठिन और सरल, सभी फाइलों का निस्तारण टेबल पर तत्काल होने लगा। पूरे शरीर में पोषण के साथ चमक फैल गई। मुख भी अपने मूल गोलाई में आ गया। पिताजी अब चने और भूट्टे तक को चुनौती देने लगे थे।

अब मैं आता हूँ अपने मूल बात पर...हुआ यूं कि, एक बार मैं पिताजी को मोटरसाइकिल पर बिठा कर एक वैवाहिक कार्यक्रम में ले जा रहा था तभी मोटरसाइकिल पर बैठे ही पिताजी को एक तेज छींक आयी। वक्षस्थल से संचित तेज वायु का प्रवाह मुख मार्ग से अचानक निकला और पिताजी के कृत्रिम दांतों को बहलाकर अपने साथ ले उड़ा। अभी पिताजी कुछ समझ भी पाते तब तक समस्त संविदाकर्मी कार्यालय छोड़कर पथरीले सड़क पर जाकर धरना दे दिये। धरना स्थल पर सेकेंड न लगा होगा, कि वहीं दो धड़े बन गये।

पिताजी ने तेज़ी से मोटरसाइकिल से उतर कर अपने पत्थर दांतों को उठाया लेकिन, उनके अलगाव से बेहद हताश और निराश हुए। वास्तव यह उनके लिये केवल आर्थिक क्षति नहीं थी बल्कि यह एक भावनात्मक और स्वास्थ्यपरक, दोनों प्रकार की क्षति थी।

पिताजी को निराश देखकर मैं दुखी हुआ किन्तु तुरन्त मेरे दिमाग में 'फैविक्विक' का विज्ञापन छप गया। मैं वहीं गाड़ी खड़ा करके निकट के दुकान से पांच रूपये का फैविक्विक लेकर भागा आया। हांलाकि, पिताजी के चेहरे पर 'दंत संगठन' को लेकर कोई आशा नहीं थी।

मैने पिताजी को विश्वास में लेकर उनके हाथों से दांत के दोनों टुकड़ों को अपने हाथों में ले लिया और उन्हें धो-पोछकर फैविक्विक की ताकत से आपस में जोड़ दिया।

पिताजी उस पांच रूपये की नन्हीं सी ट्यूब की संगठित करने की कला से चमत्कृत हुए। मेरे और ट्यूब को, पिताजी द्वारा दिया गया साधुवाद उनकी आँखों से परिलक्षित था।

कार्यालय में कुर्सियां फिर सज गयीँ। पिताजी मुस्करा कर गाड़ी पर बैठकर कार्यक्रम स्थल पर रवाना हुए।

वैसे जब हमारे सामने कोई बड़ी क्षति हो जाये तो उसके समाधान सुधार एवं निवारण और क्षतिपूर्ति की खुशी में छोटी-मोटी त्रुटि नजरअंदाज हो जाती है। सच में यही हुआ भी कि दांत को संगठित करने की खुशहाली में मुझे आभास भी न हुआ था कि उसमें बाल बराबर विचलन आ गया है; जो उस वक्त हमें नंगी आंखों से ने दिखा। पिताजी दांत के घर-वापसी के खुशी में बिल्कुल भी भांप न सके। किन्तु एक दिन बाद से ही दांतों का मुख के अन्दर का सामंजस्य पहले जैसा नहीं महसूस हुआ । पिताजी दांतों को दिन में बीस बार निकालते-बैठाते लेकिन वो पुराना वाला अनुकूलन अछूता रहता।

एक दिन पिताजी ने बिना दूसरे धड़े की अनुमति लिये एक धड़े से चना चबाने का बड़ा निर्णय ले लिया। पता नहीं दूसरे को क्या बुरा लगा कि, दूसरा धड़ा संगठन तोड़कर अपने हिस्से का दाँत लेकर अलग हो गया। कार्यालयी कार्य ठप पड़ गये। चने वाली फाइल पुनः वापस कर दी गई।

संगठित करने वाला मेरा प्रयास क्षण भर में नष्ट हो गया।

वास्तव में, कभी-जल्दबाजी में हम कोई चीज जोड़ कर खुश हो जाते हैं। जुड़ने वाली चीज देखने में भी पहले जैसी ही लगती है लेकिन बाल बराबर विचलन और न दीखने वाली दरार कब बगावत का बिगुल बजा दें यह आप जान ही नहीं सकते।

रिवेश प्रताप सिंह

गोरखपुर

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