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भोजपुरी कहानिया - Page 2

  • प्ररेणा.... : आशीष त्रिपाठी

    वो भी बारहवीं में थी लेकिन दूसरे कॉलेज में । उसकी गली से गुजरते हुए दिल की धड़कनें जब असामान्य होने लगीं तो यकीन हो गया कि इश्क की साजिश कामयाब हो रही है । वो भी कम न थी , अक्सर मुझे देख कुछ यूँ मुस्कुरा दिया करती कि मेरा अस्तित्व मेरे दिल में ही सिमटा हुआ नजर आता । अब तो बेमतलब भी उस गली से गुजरने...

  • तुहके पुतरी में राखी लें परान के तरे...

    दीवारों से न सिर्फ प्लास्टर उखड़ चुके थे अपितु ईंटों के मध्य संधि स्थापित कराने वाले सीमेंट और रेत भी धीरे - धीरे विदा हो चले थे । ईंटें फिर भी बिना किसी मध्यस्थता के एक दूसरे का हाथ थामे उस बड़ी सी इमारत के खँडहरनुमा अस्तित्व को भरसक बचाये रखने की कोशिश कर रहीं थीं । फगुनी मिसिर इस इमारत के...

  • (कहानी) बड़बोला.........: आशीष त्रिपाठी

    -'ये भैंस है ? एक खाँची खाती होगी और चार खाँची पोंक देती होगी । दूध तो देने से रही , खाली गोबर देने के काम आवेगी ये '....खूबलाल ने नई नवेली भैंस के भविष्य के बारे में भविष्यवाणी कर दी ।भैंस के स्वामी हुकुमदेव मिशिर , तीस हजार नगद खर्च कर यह भैस लाये थे । आते ही तारीफ तो सुनने से रहे , अलबत्ता...

  • (कहानी) रिश्ता... : आशीष त्रिपाठी

    राकेश की माता सुशीला जी की गायत्री देवी से पहली मुलाकात हनुमान मंदिर की सीढ़ियों पर हुई थी । दर्शन के पश्चात उतरते हुए उन्होंने एक सिक्का गायत्री देवी के पास भी फेंका था । पुराने कपड़े में लिपटी वो औरत मुस्कुराते हुए उनके पीछे दौड़ी - ' भिखारिन नहीं हूँ बहन , चिंता ने कुछ यूँ घेरा है कि चक्कर आ गया और...

  • (कहानी) मंहगी प्रसिद्धि... : अमन पाण्डेय

    नए- नए सुखद एहसास पुराने घाव को भी भरने का प्रयास करतें हैं..., लेकिन फागुन के मारे को वसन्त कितना तृप्त कर सकता है ? अब तो मन और आत्मा को भी सन्धियाँ करनी पड़ती हैं.... हँसने के लिए , प्रेम को जीने के लिए , और जीवित रहने के लिये..!!अच्छा आज जीवित ही कितने बचें हैं..? पीड़ा और असंतोष ने सचमुख निगल...

  • झुमके : आशीष त्रिपाठी

    शहर के समृद्ध सेठ और समाजसेवी , चौधरी रामनाथ की पत्नी भगवन्ता देवी इस बार मायके गईं तो दूसरे दिन दही मिले गन्ने का रस लेकर आई मंझली और उसके छोटे भाई बीरू को देख मुस्कुरा उठीं । मँझली और बीरू उनके चचेरे भाई गोविंद के बच्चे थे । भगवन्ता देवी के पिता दो भाई थे । दोनों ने अपनी मेहनत के बल पर खूब उन्नति...

  • रामचरन-काका संवाद

    गोड़ लागिंले काका......जीयs जीयs ...... का हाल बा रामचनर? कँहा रह तारs हो, तूं त एकदम सरकारी फसल बीमा के पइसा नियर नापता हो गइलs मरदे.....- नापाता नइखीं भइल काका, गांवहि त रहतानी।- गाँवे कहाँ रहतारे रे? अखिलेश यादव झूठ के ठीका तोरे के देहले ह का रे? जबसे यूपी में सामाजवाद बा सगरो डाकदर इंजीनियर...

  • इस्कियुज मी डार्लिंग...: सर्वेश तिवारी श्रीमुख

    सुबह सुबह जब आलोक पाण्डेय की नींद टूटी तो नित्य की भांति सबसे पहले मोबाईल का दर्शन किये। कोई मिस्डकॉल तो नही था, पर एक मैसेज बिना बताए पाकिस्तानी सेकुलर आतंकवादी की तरह मोबाईल में घुस गया था। पांडेजी ने मैसेज खोल कर देखा तो कांप गये, यह बबिता का मैसेज था। उसने इन्हें मकर संक्रान्ति पर दही चिउड़ा खाने...

  • आधुनिकता (कहानी)

    चुंगी तिराहे पर बजाज ढाबे के सामने , नीम के पेड़ के पास बस रुकी तो लगा आज से तीन बरस पहले का समय लौट आया है । हाथों में किताबें और बैग लिए लड़के - लड़कियां आज भी वहाँ खड़े बस का इंतजार कर रहे थे । ये वही जगह थी जहाँ से रोज मैं यूनिवर्सिटी जाने के लिए बस पकड़ता था । पता नहीं क्या सूझा और बस रुकते ही उनमें...

  • अंग अंग देहिया टूटा ता...... मकई के लावा जैसे फूटा ता

    गजब हाल है ये मरदे, मने ई ठंडी का रंग भी अलग अलग होता है। अब देखिये न, गुड्डू बाबू रोज सुबह सुबह पिछवारी खेत में भर लोटा पानी ले कर जाते हैं और आधा लोटा में ही पेट सम्बंधित समस्या को लपेट कर चले आते हैं। इस चुनौतीपूर्ण समस्या को हल करने के दौरान अगर मैदान का नुकिलेदार घास-पात गुद्देदार पृष्ठभाग में...

  • धान का बोझा से पैसा आएगा...परीक्षा का बोझा से नौकरी, पैसा, इज्जत, कटरीना सब आएगा

    ये साल भी लगभग खत्म होने के कगार पर है। उधर खेत में चाची धान का बोझा उठा रही होती हैं...इधर गुडुआ परीक्षा का बोझा उतार रहा होता है। धान का बोझा से पैसा आएगा...परीक्षा का बोझा से नौकरी, पैसा, इज्जत, कटरीना सब आएगा। बचपन में उन्नीस का पहाड़ा एक रट में याद कर लेना वाला गुडुआ को आज कर्रेंट अफेयर्स याद...

  • रजेश और पिंकी फून पर ... रिवेश प्रताप सिंह

    पिंकी- आज बाबूजी,अम्मा से हमारी बिआह टालने की बात कर रहे थे.रजेश- अरे बाप रे ! काहें भला .....पिंकी- बाऊजी कह रहे थे कि हमरे बस का नहीं कि दू कुंटल पियाज खरीद कर देश भर के लफंगों में लुटा दें.रजेश-देखो! हम मर जायेंगे पिंकी...लेकिन तुमरे बिन न रह पायेंगे.. बाऊजी से कहो कि हमरे बिआह में सब्जी भले बने...

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