Read latest updates about "भोजपुरी कहानिया" - Page 2

  • कहानी : जामुन के पेड़ का प्रोटोकॉल बरसात में ...

    मुहल्ले में एक हुआ करता था, जिसकी अहमियत बरसात के दिनों में बढ़ जाती.. शेष महीने उसका कोई प्रोटोकॉल नहीं रहता. बरसात में जब जामुन पकती तो लगातार उसके चूने.. टपकने की प्रकिया चलती रहती लेकिन पेड़ से जमीन पर टपकने पर अधिकतम जामुन क्षतविक्षत हो जाते थे. गिरने के बाद भी जामुन, साबुत बचते लेकिन...

  • चरित्रहीन गाय (व्यंग्य)

    बकलोलपुर के जंगल मे एक हत्या हो गयी। एक गाय को कई भेड़ियों में सरेआम मिल कर चीड़-फाड़ दिया। गाय चुकी सज्जन थी, विवादों से दूर रहने वाली थी, सो प्रकृति के नियमों के अनुसार उसकी हत्या एक सामान्य प्राकृतिक घटना थी। इस धरा धाम पर सृष्टि के प्रारम्भ से ही भेड़िये गायों को यूँ ही चीरते-फाड़ते रहे हैं, सो उस...

  • 'शिकायत" (कहानी)

    नित्य की भांति अपने नर्सिंग होम के सभी वार्डों का चक्कर लगाते डॉ शशिशेखर शुक्ला जब जेनरल वार्ड में पहुँचे, तो एक बेड के पास अनायास ही ठिठक गए। बेड पर एक पचास-पचपन साल की महिला पड़ी हुई थी। डॉ शुक्ला ने ध्यान से उसके चेहरे को निहारा और सर घुमा लिया।उनके मन ने जैसे कहा, ' कहीं ये...' उन्होंने...

  • फिर एक कहानी और श्रीमुख "पिता"

    उन दोनों को भागते-भागते दो दिन और तीन रातें बीत चुकी थीं। उनके दोनों घोड़े एक दिन पहले ही गिर गए थे, तबसे वे बिना रुके पैदल ही जंगलों में भागे जा रहे थे। पर अब उनके शरीर और साहस, दोनों ने जवाब दे दिया था। पिता ने कहा, 'रुक के कुछ देर विश्राम कर लो पुत्र! हम इतनी दूर आ गए हैं कि अब कम से कम प्राणों...

  • लड़िकाई कौ प्रेम-१

    भारत में यदि क्रिकेट सफलता के शीर्ष पर न होता तो संभवतः यह देश आत्मविश्वास की कमी से जूझ रहा होता। सिनेमा भी था और है परंतु यह यथार्थ कम काल्पनिक अधिक है और कम सोच वाले व्यक्ति न केवल भ्रम में डाले रहता है बल्कि भावुक भी बनाता है।पर क्रिकेट की तो बात ही निराली है। आइपीएल ने भले ही इसे थोड़ा सहिष्णु...

  • फिर एक कहानी और श्रीमुख....."भरोसा"

    ट्रेन जब तमकुही रोड टीसन पर रुकी तो खिड़की से बाहर झाँक कर देखा उसने! सबकुछ बदल गया, आदमी तो आदमी पेंड़-खुट भी नही पहचाने जा रहे। पता नहीं यह माटी भी पहचानेगी या नहीं... धोती के कोर से उसने भर आई आँखों को पोंछा और सीट पर बिछाया हुआ अपना कम्बल उठा कर लपेट लिया। उसे अगले स्टेसन पर उतर जाना था। ...

  • गुड्डू भैया, अतुल बाबू और UPSC - अभिषेक आर्यन

    पसीना से ओवरलोडेड गुड्डू भैया रोटी बेल रहे हैं...ऐसा लग रहा है जैसे आस्ट्रेलिया महाद्वीप का नक्शा उभर आया हो।इधर अतुल बाबू अपना चाइना मोबाइल में गाना बजाते हैं...'मेरा दिल भी कितना पागल है कि प्यार तो तुमसे करता है' तभी गुड्डू भैया ठेहुना से नाक का पसीना पोछते हुए कहते हैं 'अतुल बाबू आप...

  • गंगा ..---------------भाग 2....सर्वेश तिवारी श्रीमुख

    सारंडा के घने जङ्गल के बीच मे एक बड़ा सा मकान था। मकान कुछ इस प्रकार बना था कि इसका आधा हिस्सा जमीन के नीचे था। जमीन से ऊपर चार पाँच फ़ीट हिस्सा ही दिखाई देता था। उसपर भी अनेकों लताएं चढ़ी हुई थीं और दीवाल से सट कर झाड़ियां उगी हुई थीं। कुल मिला कर यह एक ऐसा घर था जो दूर से दिखाई नहीं देता था। यह...

  • "गङ्गा"......... सर्वेश तिवारी श्रीमुख

    जून का महीना, दोपहर का समय। धूप इतनी कि जैसे आग बरस रही हो। इसी धूप में एक पुरानी सी स्प्लेंडर मोटरसाइकिल पचासी- नब्बे की स्पीड में दौड़ती जा रही थी। सवार के चेहरे पर बेचैनी साफ झलक रही थी। उसे देख कर लगता था जैसे वह किसी बड़े संकट में है और जल्द से जल्द कहीं पहुँचना चाहता है। वह गाड़ी ऐसे चला रहा था...

  • लगन स्पेशल----- परछावन (हास्य)

    पिछले महीने से ही दुर्गेश बाबू धूप से भसुर की तरह बच रहे थे। सनक्रीम से लेकर गुलाबजल , ककड़ी, मलाई शायदे कुछ बचा हो जो रंग चमकाने के लिये प्रयोग न किये हों। किसी भी कीमत पर मूल रंग से छेड़छाड़ गवारा नहीं था उनको! लेकिन ऐन वक्त पर ऐसा फंसे बाबू की पूछिए मत ! एकदम खड़ी दोपहरिया में पंडित जी ने परछावनन का...

  • सरसो के फूलों पर बैठ कर आता है वसन्त!

    सरसो के फूल देख कर आपको हाथ में मेंहदी का रङ्ग और देह पर पीली चुनरी ओढ़े किसी नव-विवाहिता स्त्री का स्मरण नहीं हो आता? सरसो का पौधा जब अपने मुँह में फूल उठाता है न, तब पूरी प्रकृति महकने लगती है। ठीक वैसे ही, जैसे घर मे आई नई कनिया का पीला सिंदूर पूरे घर मे महक उठता है... हवा से सरसराती पत्तियां,...

  • बड़के नेता जी ने छोटके नेता जी को जूते से मारा...

    जनता क्रोध में है। क्रोध करने वाली जनता वही जनता है जिसे नेता जी पिछले बहत्तर वर्षों से जूता मार रहे हैं। जनता अपने ऊपर गिरते जूतों का हिसाब नहीं रखती, वह दूसरों द्वारा तीसरों पर बरसाए जाने वाले जूतों की गति नापती है। लोकतंत्र में जनता कि यही बौद्धिक सीमा तय की गई है, या कहें तो यही उसकी सामर्थ्य...

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