Read latest updates about "भोजपुरी कहानिया" - Page 2

  • सरसो के फूलों पर बैठ कर आता है वसन्त!

    सरसो के फूल देख कर आपको हाथ में मेंहदी का रङ्ग और देह पर पीली चुनरी ओढ़े किसी नव-विवाहिता स्त्री का स्मरण नहीं हो आता? सरसो का पौधा जब अपने मुँह में फूल उठाता है न, तब पूरी प्रकृति महकने लगती है। ठीक वैसे ही, जैसे घर मे आई नई कनिया का पीला सिंदूर पूरे घर मे महक उठता है... हवा से सरसराती पत्तियां,...

  • बड़के नेता जी ने छोटके नेता जी को जूते से मारा...

    जनता क्रोध में है। क्रोध करने वाली जनता वही जनता है जिसे नेता जी पिछले बहत्तर वर्षों से जूता मार रहे हैं। जनता अपने ऊपर गिरते जूतों का हिसाब नहीं रखती, वह दूसरों द्वारा तीसरों पर बरसाए जाने वाले जूतों की गति नापती है। लोकतंत्र में जनता कि यही बौद्धिक सीमा तय की गई है, या कहें तो यही उसकी सामर्थ्य...

  • फिर एक कहानी और श्रीमुख "तक्षक"

    प्राचीन भारत का पश्चिमोत्तर सीमांत!मोहम्मद बिन कासिम के आक्रमण से एक चौथाई सदी बीत चुकी थी। तोड़े गए मन्दिरों, मठों और चैत्यों के ध्वंसावशेष अब टीले का रूप ले चुके थे, और उनमे उपजे वन में विषैले जीवोँ का आवास था। यहां के वायुमण्डल में अब भी कासिम की सेना का अत्याचार पसरा था और जैसे बलत्कृता...

  • दगाबाज तोरी बतिया ना मानू रे....

    मैं भारत का इकलौता पुरुष हूँ जो समझ पाया था कि संसद में माननीय राहुल गान्ही जी ने 'आँख' किसको और क्यों मारी थी, पर मैं आज तक यह नहीं समझ पाया कि आँखों को साढ़े चौवालीस डिग्री तिरछा मोड़ कर महान सुंदरी वैजयंती माला ने दिलीप कुमार से उस फिल्म में यह क्यों कहा कि 'दगाबाज तोरी बतिया ना मानूँ रे..' आखिर...

  • कहानी .. सिक्योरिटी गार्ड का चयन और अदम्य धैर्य और अभ्यास का अनूठा उदहारण

    एक बार एक कम्पनी में सिक्योरिटी गार्ड की भर्ती में असफलता उपरांत एक लम्बे, तगड़े व्यक्ति ने चयन प्रक्रिया पर आपत्ति जताई. उसने चयनकर्ता से यह प्रश्न किया कि किस आधार पर आपने अमुक व्यक्ति का चयन किया जबकि मेरे पास सिक्योरिटी गार्ड भर्ती की प्रत्येक अहर्ता एवं योग्यता, अमुक से अधिक है। मेरी लम्बाई...

  • एक पुरानी कथा नये कलेवर में : गधे का भेजा

    जंगल का शेर बूढ़ा हो चला था। अब शरीर में इतनी ताकत न बची थी कि जंगल में उसके पंजों के निशान देखने को मिलते..सो हर वक्त अपनी मांद के सामने ही मिल जाते बूढ़े शेर । दरबार में हाजिरी लगाने वालों में ज्यादातर मक्खियाँ ही उसके सिर के इर्दगिर्द भिनभिनाती मिलतीं। कुछेक जानवर दूर से हालचाल पूछकर उनके अस्तित्व...

  • अकिला फूआएं अपनी उटपटांग सलाहों के लिए जानी जाती हैं तो बबुआ को क्या देगी सलाह

    माओवती फूआ और अकललेस बबुआ बूआ के पति चूंकि फूफा जी ही कहलाते हैं इसलिए हम भोजपुरी भाषी उनकी पत्नी को फूआ ही कहते हैं और फूआओं के इतिहास पर गौर करने से पता चलता है कि प्रसिद्ध फूआओं में 'अकिला फुआ' का नाम भोजपुरी क्षेत्रों में बड़े आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है।ये अकिला फूआएं अपनी...

  • हे पँड़ाइन! काहें नही बोल रही हो जी? हेल्लो! ओह! हेल्लो!

    गज़ब बाड़ू ए मेहरारू! मने नही टॉवर है तो छत पे चढ़ जाती। अब टॉवर कमजोर है तो सरकार को दोष मत देना अबकी अंबानी जियो का लहुरा भाई चलाएगा 'जियोह'!दिन भर में केतना बार फ़ोनवे करते है जी एक्को बार नही ढंग से बतिया पाती हो ,अरे महाराज आपन न सही बाल बच्चा लोग का खबर तो देइये दिया करो बता दे रहें है। ...

  • डाकबाबू और उनके खतओ -खतूत - रिवेश प्रताप सिंह

    जब मोबाइल नहीं था तब चिट्ठियाँ बोलतीं थीं। लेकिन चिट्ठियों के कदम थोड़े सुस्त होते थे। तब इतना आसान नहीं होता था अपने से दूर रहने वाले अपने प्रिय तक अपनी भावनाओं को पहुंचा पाना । मन के उमड़े भाव को तत्काल अपने प्रिय तक पहुंचा पाना 'भोर' में 'गोधुली' देखने जैसा था। रात्रि बेला में अपनी पति की याद आने...

  • फिर एक कहानी और श्रीमुख "घर वापसी"

    पंडित बटेसर मिसीर उस कोटि के ब्राह्मण थे, जिनके बारे में कहा जाता है कि 'दिन भर मांगे तो सवा सेर, और घण्टे भर मांगे तो सवा सेर'। विशुद्ध सुदामावादी पंडित जी दिन भर यजमानों के घर-घर घूमते तब भी इतना नहीं मिलता कि अगले दिन के लिए कुछ बचे, पर पंडीजी उतने में ही संतुष्ट रहते थे। वो दरिद्रता के दिन थे,...

  • फिर एक कहानी और श्रीमुख "भरोसा"

    ट्रेन जब तमकुही रोड टीसन पर रुकी तो खिड़की से बाहर झांक कर देखा उसने... सबकुछ बदल गया! आदमी तो आदमी पेंड़-खुट भी नहीं पहचाने जा रहे... पता नहीं यह माटी भी पहचानेगी या नही... धोती के कोर से उसने भर आई आँखों को पोंछा और सीट पर बिछाया हुआ अपना कम्बल उठा कर लपेट लिया। उसे अगले स्टेसन पर उतर जाना था। ...

  • भोजपुरी कहानी - माट्साब

    माट्साब बो अपना सुत्ती लूगा के अंचरा से लोर पोंछत दलानी में कुछ एहींगा जोहे के उपक्रम करे लगली, बाकि माट्साब के करुण क्रंदन बाहर ले सुनाव. माट्साब चिल्लात रहले 'हमके जनि काट ए बड़कू के माई, हम तहार कुल्ह बात मानब, बाकि हमके जिए द हो ! अरे बाप हो.....! अब बुझाता तलवार जोहे गईल बिया, आज हमके मुयाईये...

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