Read latest updates about "भोजपुरी कहानिया" - Page 1

  • फिर एक कहानी और श्रीमुख "कसम"

    अपनी दाढ़ी के नीचे जब उसने सेल्फ लोडेड राइफल की नली सटाई तो जाने क्यों उसके होठ मुस्कुरा उठे। उसने एक बार भय से थर थर कांपती लड़की की तरफ निगाह उठाई और पल भर में ही जैसे उसकी आँखों के आगे एक उम्र गुजर गयी।उसकी आँखे पुरानी यादों में डूबने लगीं...-क्यों जी, तुम्हारा नाम क्या है?-क्यों? नाम जान कर क्या...

  • फिर एक कहानी और श्रीमुख " हिम्मत"

    ए सरऊ, हमार तिलकवा ना चढइबs हो...'लगभग सत्तर साल के बुजुर्ग पाण्डेयजी बाजार में बैगन बेंच रहे बुजुर्ग खटिक से टिभोली मारते हैं। बूढ़ा मुस्कुरा कर जवाब देता है- चढ़ जाइ चढ़ जाइ, अब त जाड़ के दिन आवते बा, ढेर बूढ़ लो के तिलक चढ़ी अब...पाण्डेयजी मुस्कुराते हुए झिड़क देते हैं- दूर सरवा, हम अभिन ना मुएब रे, चल...

  • 'पिचत्तिस' से याद आया... ज्यों बालक कह तोतरि बाता

    'पिचत्तिस' से याद आया कि जब मैं छोटा बच्चा था तो पहली-पहली बार स्कूल गया। अब जब स्कूल गया तो यह तो मुझे याद नहीं कि मुझे 'कखगघ' किसने सीखाया पर गिनती तो वहीं सीखाया गया। मंसी जी (मास्टर साहब) पहले आगे-आगे बोल रहे थे और पीछे-पीछे बच्चों को उसे दुहरा रहे थे। बहुत हेंडसम, म्युजिकल एंड रिदमिक थी वह...

  • छठी मईया दिही न अशीष..

    भोरे भोरे आंख मिचमिचाते ही सुनने में आया कि आज छठ है । उहे छठ जिसके लिये साल भर का इंतेज़ार करते थे कभी । घाट घेरने की जल्दीबाजी, शान वाली मोहल्लेबाजी, रंगबिरंगी पतंगबाजी, अल्हड़ लफ़्फ़ाजी और जब थोड़े बड़े हुये तो गुलाबी इश्कबाजी ।सांझ में चहकना - भोर में अलसना, गुड़ वाला ठेकुआ - रसीली ऊख, गंगा जी की...

  • फिर फिर नन्द न उत्तर दीन्हो...

    गोकुल में जैसे मृत्यु की उदासी पसरी हुई थी। मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी भी बोलना भूल गए थे। गायें अपने अपने खूंटों पर निश्चेष्ट पड़ी हुई थीं। पक्षियों का कलरव शांत था। शांत पड़ी थी यमुना, शांत पड़ा था गोवर्धन पर्वत, शान्त पड़ी हुई थी गोपियां, शांत थे सब ग्वालों के बालक, जैसे गोकुल की आत्मा निकल गयी हो।...

  • नाम याद नहीं मुझे....... (कहानी)

    क्लास, सातवीं से आठवीं हो गई तब महसूस किया कि कुछ बदल रहा है। कपड़ों में सलवार दुपट्टे की गिनती बढ़ी। मम्मी पहले से ज्यादा चौकन्नी हो गयीं। थोड़ी दुपट्टे को लेकर मैं भी सतर्क हुई। स्कूल जाने के लिए सहेलियों का एक ग्रुप साथ हो गया। लड़कों का कोई झुण्ड देखते ही सिर झुक जाना, चिड़ियों की तरह चहचहाहट को बीच...

  • तारिका की फ़टी जीन्स

    युगों पुर्व प्रेमचंद के फ़टे जूते देख कर महान साहित्यकार परसाई के ज्ञान चक्षु कितने खुले थे यह तो वही जानते होंगे, पर इस रूपवती तारिका की फ़टी जीन्स देख कर मेरे ज्ञान चक्षु उसी प्रकार खुल गए जिस प्रकार धर्म परिवर्तन कर लेने से किसी दरिद्र के भाग्य खुल जाते हैं। इस तस्वीर को देखने के पुर्व मैं स्वयं...

  • बाँस...

    बाँस के गुणों और इसकी उपयोगिता से परिचित तो था ही लेकिन जब, बाँस की विकिपीडिया पढ़ा... पता चला जितना मैं जानता था बाँस उससे कहीँ बहुत ज्यादा गुणवान और उपयोगी है। वो बात अलग है कि लोगबाग को बाँस के गुणों के विषय में जानने की उतनी रुचि नहीं रहती जितना किसी उत्सर्जी मार्ग को अवरुद्ध करने की। जी हाँ!...

  • दरार..... : रिवेश प्रताप सिंह

    ईश्वर की अनुकंपा, नियमित दवाइयों के सेवन एवं नपी-तुली नियमबद्ध दिनचर्या के बल पर पिताजी लगभग अस्सी वर्ष की अवस्था में भी बिल्कुल स्वस्थ हैं।वैसे मानव का शरीर एक परिवार की भांति ही होता है। शरीर का प्रत्येक अंग परिवार के सदस्यों की तरह कार्य करता है, और यह शरीर रूपी परिवार बिना किसी परेशानी के...

  • सीता बनवास...

    रामकथा में सीता बनवास एक ऐसा प्रसङ्ग है, जो बुद्धिजीवियों को सदैव आनंदित करता रहा है। कारण यह, कि इस प्रसङ्ग पर तर्क, कुतर्क की अनंत सम्भावनाएं हैं। इस विषय पर ज्ञानी, विज्ञानी, अज्ञानी सब खूब तर्क कर लेते हैं, और सबको तृप्ति मिल जाती है।वैसे अब यह पूर्णतः सिद्ध हो चुका है कि वाल्मीकि रामायण का...

  • पुड़िया.....रिवेश प्रताप सिंह

    थोक गल्ला मंडी में मेरा जाना महीने में केवल एक दिन होता था या यूँ समझिए कि वेतन गिरने के दो-चार दिन के भीतर झोला उठ जाता था।थोक गल्ला मंडी में हर क्रेता की एक फिक्स दुकान होती है और क्रेता किसी विशेषता के कारण अपने विक्रेता को पसंद करता है। वैसे ही जैसे आजकल सबकी अपनी-अपनी पार्टियाँ। खैर मेरी भी एक...

  • लोहे के पिंजड़े में पाँच सौ एसएलआर राइफल वाले सुरक्षा कर्मियों से घिरे....रामलला

    कल अयोध्या में थे। दो फिट चौड़े और सात फुट ऊँचे लोहे के पिंजड़े में डेढ़ किलोमीटर चलने के बाद बीस फिट गुणे तीस फिट के तिरपाल में दिखे रामलला। लगभग पाँच सौ एसएलआर राइफल वाले सुरक्षाकर्मियों से घिरे.... लगभग सौ बीघे जमीन को लोहे के मोटे-मोटे खम्भों से इस तरह घेरा गया है जैसे जगत का सबसे सशक्त बन्दीगृह...

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