Read latest updates about "भोजपुरी कहानिया" - Page 1

  • अकिला फूआएं अपनी उटपटांग सलाहों के लिए जानी जाती हैं तो बबुआ को क्या देगी सलाह

    माओवती फूआ और अकललेस बबुआ बूआ के पति चूंकि फूफा जी ही कहलाते हैं इसलिए हम भोजपुरी भाषी उनकी पत्नी को फूआ ही कहते हैं और फूआओं के इतिहास पर गौर करने से पता चलता है कि प्रसिद्ध फूआओं में 'अकिला फुआ' का नाम भोजपुरी क्षेत्रों में बड़े आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है।ये अकिला फूआएं अपनी...

  • हे पँड़ाइन! काहें नही बोल रही हो जी? हेल्लो! ओह! हेल्लो!

    गज़ब बाड़ू ए मेहरारू! मने नही टॉवर है तो छत पे चढ़ जाती। अब टॉवर कमजोर है तो सरकार को दोष मत देना अबकी अंबानी जियो का लहुरा भाई चलाएगा 'जियोह'!दिन भर में केतना बार फ़ोनवे करते है जी एक्को बार नही ढंग से बतिया पाती हो ,अरे महाराज आपन न सही बाल बच्चा लोग का खबर तो देइये दिया करो बता दे रहें है। ...

  • डाकबाबू और उनके खतओ -खतूत - रिवेश प्रताप सिंह

    जब मोबाइल नहीं था तब चिट्ठियाँ बोलतीं थीं। लेकिन चिट्ठियों के कदम थोड़े सुस्त होते थे। तब इतना आसान नहीं होता था अपने से दूर रहने वाले अपने प्रिय तक अपनी भावनाओं को पहुंचा पाना । मन के उमड़े भाव को तत्काल अपने प्रिय तक पहुंचा पाना 'भोर' में 'गोधुली' देखने जैसा था। रात्रि बेला में अपनी पति की याद आने...

  • फिर एक कहानी और श्रीमुख "घर वापसी"

    पंडित बटेसर मिसीर उस कोटि के ब्राह्मण थे, जिनके बारे में कहा जाता है कि 'दिन भर मांगे तो सवा सेर, और घण्टे भर मांगे तो सवा सेर'। विशुद्ध सुदामावादी पंडित जी दिन भर यजमानों के घर-घर घूमते तब भी इतना नहीं मिलता कि अगले दिन के लिए कुछ बचे, पर पंडीजी उतने में ही संतुष्ट रहते थे। वो दरिद्रता के दिन थे,...

  • फिर एक कहानी और श्रीमुख "भरोसा"

    ट्रेन जब तमकुही रोड टीसन पर रुकी तो खिड़की से बाहर झांक कर देखा उसने... सबकुछ बदल गया! आदमी तो आदमी पेंड़-खुट भी नहीं पहचाने जा रहे... पता नहीं यह माटी भी पहचानेगी या नही... धोती के कोर से उसने भर आई आँखों को पोंछा और सीट पर बिछाया हुआ अपना कम्बल उठा कर लपेट लिया। उसे अगले स्टेसन पर उतर जाना था। ...

  • भोजपुरी कहानी - माट्साब

    माट्साब बो अपना सुत्ती लूगा के अंचरा से लोर पोंछत दलानी में कुछ एहींगा जोहे के उपक्रम करे लगली, बाकि माट्साब के करुण क्रंदन बाहर ले सुनाव. माट्साब चिल्लात रहले 'हमके जनि काट ए बड़कू के माई, हम तहार कुल्ह बात मानब, बाकि हमके जिए द हो ! अरे बाप हो.....! अब बुझाता तलवार जोहे गईल बिया, आज हमके मुयाईये...

  • फिर एक कहानी और श्रीमुख "कसम"

    अपनी दाढ़ी के नीचे जब उसने सेल्फ लोडेड राइफल की नली सटाई तो जाने क्यों उसके होठ मुस्कुरा उठे। उसने एक बार भय से थर थर कांपती लड़की की तरफ निगाह उठाई और पल भर में ही जैसे उसकी आँखों के आगे एक उम्र गुजर गयी।उसकी आँखे पुरानी यादों में डूबने लगीं...-क्यों जी, तुम्हारा नाम क्या है?-क्यों? नाम जान कर क्या...

  • फिर एक कहानी और श्रीमुख " हिम्मत"

    ए सरऊ, हमार तिलकवा ना चढइबs हो...'लगभग सत्तर साल के बुजुर्ग पाण्डेयजी बाजार में बैगन बेंच रहे बुजुर्ग खटिक से टिभोली मारते हैं। बूढ़ा मुस्कुरा कर जवाब देता है- चढ़ जाइ चढ़ जाइ, अब त जाड़ के दिन आवते बा, ढेर बूढ़ लो के तिलक चढ़ी अब...पाण्डेयजी मुस्कुराते हुए झिड़क देते हैं- दूर सरवा, हम अभिन ना मुएब रे, चल...

  • 'पिचत्तिस' से याद आया... ज्यों बालक कह तोतरि बाता

    'पिचत्तिस' से याद आया कि जब मैं छोटा बच्चा था तो पहली-पहली बार स्कूल गया। अब जब स्कूल गया तो यह तो मुझे याद नहीं कि मुझे 'कखगघ' किसने सीखाया पर गिनती तो वहीं सीखाया गया। मंसी जी (मास्टर साहब) पहले आगे-आगे बोल रहे थे और पीछे-पीछे बच्चों को उसे दुहरा रहे थे। बहुत हेंडसम, म्युजिकल एंड रिदमिक थी वह...

  • छठी मईया दिही न अशीष..

    भोरे भोरे आंख मिचमिचाते ही सुनने में आया कि आज छठ है । उहे छठ जिसके लिये साल भर का इंतेज़ार करते थे कभी । घाट घेरने की जल्दीबाजी, शान वाली मोहल्लेबाजी, रंगबिरंगी पतंगबाजी, अल्हड़ लफ़्फ़ाजी और जब थोड़े बड़े हुये तो गुलाबी इश्कबाजी ।सांझ में चहकना - भोर में अलसना, गुड़ वाला ठेकुआ - रसीली ऊख, गंगा जी की...

  • फिर फिर नन्द न उत्तर दीन्हो...

    गोकुल में जैसे मृत्यु की उदासी पसरी हुई थी। मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी भी बोलना भूल गए थे। गायें अपने अपने खूंटों पर निश्चेष्ट पड़ी हुई थीं। पक्षियों का कलरव शांत था। शांत पड़ी थी यमुना, शांत पड़ा था गोवर्धन पर्वत, शान्त पड़ी हुई थी गोपियां, शांत थे सब ग्वालों के बालक, जैसे गोकुल की आत्मा निकल गयी हो।...

  • नाम याद नहीं मुझे....... (कहानी)

    क्लास, सातवीं से आठवीं हो गई तब महसूस किया कि कुछ बदल रहा है। कपड़ों में सलवार दुपट्टे की गिनती बढ़ी। मम्मी पहले से ज्यादा चौकन्नी हो गयीं। थोड़ी दुपट्टे को लेकर मैं भी सतर्क हुई। स्कूल जाने के लिए सहेलियों का एक ग्रुप साथ हो गया। लड़कों का कोई झुण्ड देखते ही सिर झुक जाना, चिड़ियों की तरह चहचहाहट को बीच...

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