Read latest updates about "भोजपुरी कहानिया" - Page 1

  • इस प्यार को क्या नाम दूँ

    इन 60-65 साल के अंकल आंटी का झगड़ा ही ख़त्म नहीं होता...एक बार के लिए मैंने सोचा अंकल और आंटी से बात करूं क्यों लड़ते हैं हरवक़्त, आख़िर बात क्या है... फिर सोचा मुझे क्या, मैं तो यहाँ मात्र दो दिन के लिए ही तो आया हूँ...मगर थोड़ी देर बाद आंटी की जोर-जोर से बड़बड़ाने की आवाज़ें आयीं तो मुझसे रहा नहीं...

  • त्योहारी गुलाब... सर्वेश तिवारी श्रीमुख

    नवम्बर का महीना उदासियों का महीना रहा है। मन नहीं लगता। गाँव उस घर की तरह लगता है, जिस घर से बेटी विदा हुई हो। आदमी उदास, पेंड़ उदास, हवा-पानी उदास... पता नहीं कौन और क्यों घनानंद की कविता गा जाता है। हालाँकि गाँवों के लिए नवम्बर अब बेटियों से अधिक बेटों के विदा होने का महीना हो गया है। नवम्बर...

  • फिर एक कहानी और श्रीमुख "टेक"

    संझलौका की बेला में यदि बिशम्भरपुर गांव की हवा में तरकारी के फोरन की खुशबु तैर जाय तो बच्चे तक बूझ जाते हैं कि रमा बुआ के रसोई से ही यह खुशबु आ रही है। आज के हाइब्रिड वाले जमाने में जब गोभी और परवल तक का स्वाद मर गया, यहां तक कि धनिया की चटनी भी अब नही महकती, रमा बुआ की रसोई की तरकारी पता नही कैसे...

  • बिहार.... जहाँ आज भी ख़नक जिंदा है!

    हमें जीवन में जब किसी भौगोलिक क्षेत्र की सामाजिक व सांस्कृतिक आत्मा को जानने समझने की जिज्ञासा होती है तो 'बिहार' की। उसी बिहार में जहाँ आधा जीवन बुद्ध व महावीर भटक के बिता दिए, वही बिहार जहाँ से राजेन्द्र बाबू जैसे सहज निःस्वार्थ महात्मा हुए, वही बिहार जो प्रत्येक कालखण्ड में शासन की निरंकुशता का...

  • रद्दी (कहानी)

    गर्मी की छुट्टी आधा बीत गई लेकिन तू किताब खोल कर एक अक्षर नहीं पढ़ा। संवरू की अम्मा ने रोटी बेलना रोक कर संवरू को घूर कर कहा।अम्मा.... का करें बताओ..... दसवीं की किताब है नहीं। बाऊजी से पन्द्रह दिन से किताब खरीदने को कह रहे हैं वो हैं कि रोज टाल जाते हैं। कहते हैं कल लायेंगे, परसों लायेंगे लेकिन...

  • गीलापन.....रिवेश प्रताप सिंह

    बरसना एक वेग है, प्रवाह और ऊर्जा है। लेकिन बरसने के बाद का गीलापन...एक ठहराव है, शिथिलता और जड़ता है! जवानी की धार को कुंद करने का षडयंत्र है। नोंक पर हथोड़े से किया गया प्रहार है।भींग जाना तो मजे की बात है लेकिन गीलापन उतनी ही मुश्किल और बेलुत्फ़ी का भी नाम है। गीलापन शरीर के भीतर उठ रही लपट और तपिश...

  • लखनू पंडित...गायन मंडली . रिवेश प्रताप सिंह

    लखनू पंडित और उनकी गायन मंडली दस बीस गाँवों में अपने गीत-गुंजन हारमोनियम, तबले और खजड़ी से खूब जानी पहचानी जाती थी. पंडीजी के दुआर पर सुबह दो- चार लोग सट्टा बुक करने के लिए खड़े ही मिलते क्योंकि सुबह के बाद मंडली किस गांव या चौराहे पर भजन-कीर्तन गा रही है यह पता करना एक टेढ़ी खीर थी.लखनू पंडित का कोई...

  • सख्त जबरदस्त... रिवेश प्रताप सिंह

    'सख्त' शब्द बहुत वास्तव में 'सख्त' होता है.. इसीलिये तो, जब लोग मना करने पर नहीं मानते तब मिटाकर दुबारा यह लिखना पड़ता है कि 'यहाँ पेशाब करना सख्त मना है' लोग बताते हैं कि जब कोई मोहब्बत से पेश आने पर भी बाज़ न आये तब उस पर सख्ती से पेश आया जाता है. अपने ही अनचाहे बालों को उखाड़ना, सख्ती का एक देखा-...

  • सनातनी परम्परा पैरों की छाप... सर्वेश तिवारी श्रीमुख

    सनातन की परम्परा है, 'नवबधु जब उतरती है तो चौकठ के पास थाल में महावर रखा होता है जिसमें पैर रख कर वह आगे बढ़ती है। अपने पैरों की छाप छोड़ते हुए...' नववधू लक्ष्मी होती है न! वह अपने साथ धन-धान्य-सौभाग्य-आरोग्य ले कर आती है। उसके चरण लक्ष्मी के चरण होते हैं, उन चरणों की छाप लम्बे समय तक घर में बनी...

  • तीज स्पेशल..... रिवेश प्रताप सिंह

    तीज में कल शहर,बाज़ार, चौराहे देर रात तक चहलकदमी और खरीदारी से रौशन रहे। मेंहदी, श्रृंगार और मिष्ठान के प्रतिष्ठानों ने खूब चांदी काटी... मेंहदी रचने वालों के हाथों की तो बल्ले बल्ले थी। और उसमें पुरूष मेंहदी रचनाकारों की तो पूछिए मत! मुझे तो यकीन ही नहीं होता कि जब देर रात को ये पैसा कमाकर घर लौटते...

  • कृष्ण गोकुल से गए ....सिसकियां और आह बची

    कृष्ण गोकुल से जा चुके थे, और साथ ही गोकुल से जा चुका था आनंद। लोगों की हँसी जा चुकी थी, आपसी चुहल जा चुकी थी, पर्व-त्योहार-उत्सव जा चुके थे। गोकुल में यदि कुछ बचा था तो केवल सिसकियां और आह बची थी। पूरे गोकुल में एक ही व्यक्ति था जो सबकुछ सामान्य करने का प्रयत्न करता फिरता था, वे थे नंद।...

  • कभी सूरदास ने एक स्वप्न देखा था, कि रुख्मिनी और राधिका मिली हैं और एक दूजे पर निछावर हुई जा रही हैं।

    कभी सूरदास ने एक स्वप्न देखा था, कि रुख्मिनी और राधिका मिली हैं और एक दूजे पर निछावर हुई जा रही हैं। सोचता हूँ, कैसा होगा वह क्षण जब दोनों ठकुरानियाँ मिली होंगी। दोनों ने प्रेम किया था। एक ने बालक कन्हैया से, दूसरे ने राजनीतिज्ञ कृष्ण से। एक को अपनी मनमोहक बातों के जाल में फँसा लेने वाला...

Share it
Top