फिर एक बार राम....

फिर एक बार राम....

राम अपने हर रुप में अद्भुत है। एक पुत्र के रूप में, पति के रूप में, भाई के रूप में, राजा के रूप में, पिता के रूप में... अपने हर रूप में उन्होंने मर्यादा की स्पष्ट परिभाषा स्थापित की है। तभी तो उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया।

आप यदि मुझसे पूछें कि मुझे उनका कौन सा रूप सबसे प्रिय है, तो मैं कहूंगा कि राम मुझे सबसे अधिक एक पुत्र के रूप में प्रभावित करते हैं। अहा! कोई तुलना ही नहीं है... एक पुत्र के रूप में राम की जो भूमिका है उसकी तुलना सम्पूर्ण जगत की किसी भी सभ्यता के किसी भी नायक से हो ही नहीं सकती।

बानगी देखिए। 1 दिन बाद राज्याभिषेक होने वाला है, और घर में विमाता, दासी के साथ मिलकर षड्यंत्र कर रही है। धर्मसंकट में पड़े, पुत्रमोह से पीड़ित पिता के कक्ष में राम को बुलाया जाता है और माता कैकई उनसे कहती हैं कि मैंने तुम्हारे पिता से तुम्हारे लिए 14 वर्ष का वनवास और भरत के लिए राज्य मांगा है। अब राम की प्रतिक्रिया देखिए, वे मुस्कुरा रहे हैं। तुलसी बाबा लिखते हैं,

" मन मुसुकाइ भानुकुल भानू। रामु सहज आनंद निधानू।।"

कैकई के षड्यंत्र पर राम का उत्तर सुनिए,

"सुनु जननी सोई सुतु बड़भागी। जो पितु मातु बचन अनुरागी।।"

मैं बड़भागी हूँ अम्मा, जो मुझे पिता के वचन को निभाने का अवसर मिला है। मैं सौभाग्यशाली हूँ जो मुझे आप जैसी माँ मिली है।

ये हैं राम...

भरत मिलाप का दृश्य याद कीजिये, समूची अयोध्या राम की कुटिया तक पहुँची है पर राम की दृष्टि सर्वप्रथम खोजती है माता कैकेई को... बाबा लिखे हैं, "प्रथम राम भेंटी कैकेई, सरल सुभाव भगति मति भेई।" एक पुत्र के रूप में राम का स्वयं पर यह अनुशासन है कि किसी भी प्रकार से माँ को कष्ट न हो, उन्हें कुछ बुरा न लगे...

वन से अयोध्या लौटते भरत को गले लगा कर मेरा आराध्य अपने जीवन में पहली बार किसी से कुछ मांगता है, तो यही मांगता है कि "भरत! माता कैकई का ध्यान रखना।"

ये हैं राम....

युद्ध भूमि में जब लक्ष्मण को शक्ति लगती है, तब भी राम को माँ की ही चिन्ता है। लक्ष्मण को हृदय से लगा कर रोते राम कहते हैं,

"निज जननी के एक कुमारा। तात तासु तुम्ह प्रान अधारा।।

सौपेंसि मोहि तुम्हहि गहि पानी।सब बिधि सुखद परम् हित जानी।।

उतरु काह दैहउँ तेहि जाई। उठि किन मोहि सिखावहु भाई।।"

राम को युद्ध की चिन्ता नहीं, पत्नी की चिंता नहीं, चिंता है माँ की। क्या उत्तर दूँगा माता सुमित्रा को? उन्होंने मुझे अपना पुत्र सौंपा था... क्या कहूँगा उनसे?

ये हैं राम...

राम जैसा पुत्र इस जगत में अन्य कोई नहीं। तभी तो तब से अब तक भारत की प्रत्येक माँ ने अपनी कोख से "राम" ही माँगा है। भारत की प्रत्येक माँ ने अपने बेटे के जन्म पर राम का ही सोहर गाया है। राम व्यक्ति नहीं संस्कार हैं, राम संस्कार के अवतार हैं।

यदि आप अपने बच्चों में संस्कार डालना चाहते हैं तो बचपन में ही उनका परिचय राम से कराइये। और स्मरण रहे, बच्चे का राम से परिचय उस टीवी शो के माध्यम से न हो जिसे लिखते समय लेखक राम के स्थान पर टीआरपी को केंद्र में रखता है। राम से बच्चे का परिचय कराइये तो मानस के माध्यम से कराइये। बच्चा यदि राम को समझ गया तो जीवन को समझ जाएगा। पुत्र की जंघा पर सर रख कर मरने का सौभाग्य तभी मिलेगा जब पुत्र राम को जाने, नहीं तो अस्पताल की नर्से जिंदाबाद हैं ही...

तो फिर बोलिये एक बार, जय जय श्री राम...😊

भारत की हर माँ की कोख में राम उतरें, जय हो...

सर्वेश तिवारी श्रीमुख

गोपालगंज, बिहार।

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