समस्त कार्यों की सिद्धि हेतु सौन्दर्यलहरी के कुछ विशिष्ट प्रयोग : प्रेम शंकर मिश्र

समस्त कार्यों की सिद्धि हेतु सौन्दर्यलहरी के कुछ विशिष्ट प्रयोग : प्रेम शंकर मिश्र

आदिगुरू भगवत्पाद शंकराचार्य ने सौन्दर्य लहरी नामक ग्रन्थ में मां त्रिपुरसुन्दरी के स्वरूप का बहुत ही सुन्दर वर्णन किया है। उनके अनिवर्चनीय स्वरूप का वर्णन करने के लिए ही उन्होंने सौन्दर्य लहरी ग्रन्थ की रचना की जिसमें उन्होंने बहुत ही सुन्दर ढंग से मां की स्तुति की है। वास्तव में इसके दो खण्ड हैं…..आनन्द लहरी और सौन्दर्य लहरी। इन दोनों को एकत्र करके ही सौन्दर्य लहरी का नाम दिया गया है। इसमें प्रस्तुत स्तुति बहुत ही प्रभावी और रहस्यों से परिपूर्ण है। इससे कई साधनांए एवं ऐसे प्रयोग सिद्ध होते हैं, जो मानव जीवन के लिए अत्यन्त ही महत्वपूर्ण हैं।

भगवती त्रिपुर सुन्दरी की इस स्तुति से साधकों को अत्यन्त ही सुख, शांति एवं परम ज्ञान की प्राप्ति होती है। उस परम शक्ति के प्रकाश से सम्पूर्ण जगत प्रकाशमान है। यन्त्र, मन्त्र एवं तन्त्र के माध्यम से हम उनकी उपासना बाह्य रूप में करते हैं।


त्वदन्य: पाणिभ्यामभयवरदो दैवतगण-

स्त्वमेका नैवासि प्रकटितवराभीत्यभिनया।

भयात्त्रातुं दातुं फलमपि च वाञ्छासमधिकम्

शरण्ये लोकानां तव हि चरणावेव निपुणौ।।

【सौन्दर्यलहरी ४】

'हे शरणार्थियों को शरण देने वाली ! आपको छोड़कर जितने भी दूसरे देवता हैं, वे अपने हाथों से ही अभय और वरदान का काम लेते हैं, इसीसे तो उन्होंने अपने हाथों में अभय और वरद मुद्रा धारण कर रखी है।

आप ही एक ऐसी हो, जो इन दोनों ही मुद्राओं को धारण करने का स्वांग नहीं रचती।

रचने भी क्यों लगी ! आपको इसकी आवश्यकता ही क्या है ?

आपके तो दोनों चरण ही आश्रितों को सब प्रकार के भयों से मुक्त करने तथा उन्हें उनके इच्छित फल से भी अधिक देने में समर्थ है।

आपके हाथ सदा शत्रुसंहार के काम में ही लगे रहते हैं, क्योंकि भक्तों के लिये तो आपके चरण ही पर्याप्त है।

(आद्य श्रीशंकराचार्य विरचित सौन्दर्यलहरी का चौथा श्लोक)

यहाँ इस मन्त्र एवं यन्त्र का प्रयोग इन दोनों के माध्यम से हम अपने जीवन की बहुत सी समस्याओं का समाधान भगवती की कृपा से कर सकते हैं। यन्त्रों की उत्पत्ति भगवान शिव के ताण्डव नृत्य से मानी जाती है। मन्त्रों के साथ यन्त्रों का प्रयोग आदि काल से होता रहा है। अतः साधक दोनों का प्रयोग करें।

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