सबड़े बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई की साख में बट्टा - सुमित यादव

सबड़े बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई की साख में बट्टा - सुमित यादव


देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो अभी अपनी आंतरिक कलह से उबरी भी नहीं थी कि एक के बाद दूसरी राज्य सरकार ने अपने राज्य में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को दी गई जांच करने की आम सहमति वापस ले ली है। इसमे सबसे पहले आंध्र प्रदेश और फिर पश्चिम बंगाल ने आदेश जारी किया जिसके अनुसार सीबीआई को अब राज्य से जुड़ी किसी भी जांच के लिए राज्य सरकार से अनुमति लेनी होगी। इस घटना से सीबीआई की जांच शक्ति को सीमित करने और उसे राजनीतिक मुद्दा बनाने की शुरूआत हो गयी है जिसे कतई उचित नहीं कहा जा सकता है।

इतिहास पर गौर करें सीबीआई की स्थापना ब्रिटिश काल में भारतीय युद्ध और आपूर्ति विभाग में भ्रष्टाचार और घूसखोरी को रोकने एवं कार्यवाही के लिए 1941 में की गई थी। उस समय इसका नाम दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान हुआ करता था। इसके बाद दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान अधिनियम 1946 के तहत इसके दायरे में केंद्र सरकार के सभी विभाग और संघ राज्य क्षेत्र भी आ गये। 1 अप्रैल 1963 को इसका नाम बदलकर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो कर दिया गया। धीरे धीरे इसके जांच अधिकार सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों तथा 1969 में जब बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ तब राष्ट्रीयकृत बैंको तक हो गये। राज्यों के मामले में दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान अधिनियम 1946 सेक्शन 6 में कहा गया है कि सीबीआई किसी मामले, जो राज्य सरकार से जुड़ा हो, की जांच के लिए राज्य सरकार से अनुमति लेगी। लेकिन धीरे-धीरे करीब करीब सभी राज्यों ने सीबीआई की महत्वता को ध्यान में रखकर इसकी जांच दायरे को बढ़ाने और शीघ्र निष्पक्ष क्रियान्वयन के उद्देश्य से आम सहमति दे रखी थी परंतु सीबीआई पर लग रहे दागों ने अब ना केवल उसकी छवि को धूमिल किया है बल्कि राज्य सरकारों के मन में भय की भावना पैदा कर रखी है और करीब करीब इसी की अभिव्यक्ति आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल में देखी जा रही है परंतु सीबीआई से आम सहमति वापस लेने का यह पहला मामला नहीं है कई राज्य जैसे; नागालैंड, सिक्किम, मिजोरम और छत्तीसगढ़ पहले ऐसा कर चुके हैं।

लेकिन इस बार बंगाल और आंध्र प्रदेश के निर्णय के पीछे जो मुख्य कारण हैं उन्हें समझना होगा। पहला, क्योंकि अगले साल लोकसभा चुनाव है और इस समय पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं जो आगामी लोस चुनाव को भी प्रभावित कर सकते हैं, इसलिये सीबीआई पर रोक लगाकर ये राज्य आमजन को यह संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं कि केन्द्र की सीबीआई अब अनौचित्यपूर्ण हो गई है। केन्द्र के हस्तक्षेप ने उसे वास्तव में पिंजरे में बंद तोता बना दिया है। और हालत ये हो गयी है कि सीबीआई के निदेशक, विशेष निदेशक जैसे पदों पर आसीन अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं। और उनके अधिकारी एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। दूसरा,इन राज्यों को इस बात का भय भी हो सकता है कि कहीं केन्द्र सीबीआई के सहारे लोस चुनाव से पहले उन पर ही छापेमारी न करा दे और उन्हें किसी मामले में ना फंसा दिया जाए।

फिलहाल इन दो राज्यों की देखदेखा क्या अभी और राज्य आम सहमति वापस लेंगे यह तो भविष्य के गर्भ में है पर यह भी सत्य है की आम सहमति वापस लेने से सीबीआई के मूल कायों पर बहुत अधिक असर नहीं होगा। जैसा कि मैंने पहले बताया है कि दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान एक्ट 1946 के द्वारा सीबीआई को राज्यों से जुड़े मामले में राज्य की सहमति लेनी होती है। परंतु केंद्र तथा अन्य संघ शासित प्रदेशों से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों की जांच में राज्यों की अनुमति की आवश्यकता नहीं होती और ऐसे मामलों की जांच के लिये वह किसी भी राज्य में छापे मार कर साक्ष्य जुटा सकती है। अब चूंकि लाॅ एड आर्डर राज्य का विषय है इसलिये यदि सीबीआई राज्य से जुड़े मामले की जांच करना चाहती है तो ऐसी स्थिति में राज्य सरकार की अनुमति की आवश्यकता होती है लेकिन इसमे भी अगर हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट उस मामले की जांच सीबीआई को करने का आदेश देता है तो सीबीआई इस मामले में जांच कर सकती है तब भी उसे राज्य की अनुमति नही लेनी होगी। अतः हम कह सकते कि राज्यों की आम सहमती बापसी से सीबीआई के कामकाज में बहुत बड़ा फर्क तो नहीं पड़ने वाला परंतु यह भी नहीं कहा जा सकता कि फर्क ही नही पड़ेगा। भारत राज्यों का संघ है परंतु शक्तियों का झुकाओ केंद्र की ओर है और हमारे यहां राज्यों को उतनी स्वायत्त नहीं है जितनी अमेरिका जैसे दोहरी नागरिकता वाले देशों में हैं। यहाँ

हम राज्य के निवासी हो सकते है पर नागरिकता में हम भारतीय ही माने जाते हैं। और ऐसे में यदि राज्य केंद्र की जांच एजेंसी को राज्यों के मामले में दखल देने से रोकते हैं तो यह कहीं ना कहीं संधीय ढांचे और सहकारी संघवाद की अवधारणा को कमजोर करने वाला ही कहा जायेगा। यदि कल को राज्य की सह पर बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार होता है तो सीबीआई को जांच करने के लिए राज्य की अनुमति लेनी पड़ेगी जो कि मुश्किल होगी और राज्य इसमे देरी करके साक्ष्यों को मिटा सकते हैं।

अंततः यही कहा जा सकता हैं कि सीबीआई की कलह से ना केवल उसकी स्वम की छवि पर ग्रहण लगा है बल्कि इस मामले में राज्यों को भी अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने का अवसर मिल गया जो स्वयं सीबीआई द्वारा परोसा गया है। यह पहली बार नहीं है कि सीबीआई स्वयं कटघरे में खड़ी है इसमें सुधार की मांग तो लंबे समय से की जा रही है। परंतु परिणाम वही ढाक के तीन पात रहे हैं। यदि शीघ्र ही दोषियों पर कार्रवाई और सीबीआई में सुधार के लिए त्वरित कदम नहीं उठाए गए तो इसमें कोई दोराय नहीं कि आज की स्थिति की पुनरावृत्ति फिर हो सकती है। और तब हमारे पास पछताने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।

सुमित यादव

रावगंज, कालपी( उ.प्र)

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